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योग्यता : एक सोच

योग्यता : एक सोच

©भारतका एक ब्राह्मण.
संजय कुमार मिश्र"अणु"
आजकल यह शब्द बहुत प्रचलन में है।आये दिन लोग इसका प्रयोग धड़ले से कर रहे है।अभी बिहार की राजनैतिक पृष्ठभूमि में यह शब्द कुछ ज्यादा ही प्रयुक्त है।यहां के राजनेता लोग ही अपनी अपनी राजनीति के चक्कर में एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाकर यहां की अशिक्षित या फिर साक्षर लोगों को बेवकूफ बना रहे है।कभी पक्ष विपक्ष पर आरोप लगा रहा है तो कभी विपक्ष पक्ष पर।एक पक्ष का कहना है कि मेरा विपक्ष नवीं फेल है तो विपक्ष का आरोप है कि सत्तारूढ़ सातवीं कक्षा भी पास नहीं है।
हिंदी की ये योग्यता संस्कृत के युज धातु से बना शब्द है।जिसका शाब्दिक अर्थ जोड़ना,निभाना और साधना होता है।युज धातु में जब यत प्रत्यय लगता है तब योग्य शब्द बनता।इस विशेषण शब्द को जा भाववाचक संज्ञा बनाने के लिए हिंदी का ता प्रत्यय लगता है तो योग्यता शब्द बनता है जिसका अर्थ समर्थ,कुशलता,कार्य करने की आंतरिक क्षमता वाला होता है।
योग्यता की अपनी विशेषता है।इस योग्यता को लोग अपनी स्वार्थ साधना के लिए प्रयोग कर रहे है।इस मानव जीवन का विविध पक्ष है।जिसमें पारिवारिक,सामाजिक,
आर्थिक,राजनैतिक और शैक्षणिक आदि है।शब्दों का तो अपना अर्थ संकोचन और अर्थ विस्तार वाला स्वभाव सर्विदित है।जहाँ हर शब्द का एक निश्चित अर्थ होता है वहीं विशेष अर्थ भी होता है।विशेष अर्थ वक्ता के प्रयोग,प्रयोजन,परिस्थिति वश होता है।
यहां जो सातवीं और दसवीं पास वाला आरोप प्रत्यारोप है वह सिर्फ शैक्षणिक योग्यता की बात है अन्य योग्यता के संदर्भ में यह शब्द यहां प्रयुक्त नहीं है।भले ही वक्ता इसका प्रयोग अर्थ विस्तार के संदर्भ में किया होगा पर श्रोता उसका भी अर्थ संकुचित कर अर्थ रसप्लवित हो रहा है।होना चाहिए।जिसको जैसे आनंद मिले उसे लेना चाहिए।सबका अपना अपना दिल दिमाग है।ग्रहण और त्याग की अपनी क्षमता है।
किसी खास या क्षेत्र विशेष की योग्य न होना कोई मायने नहीं रखता है।इधर के लिए अयोग्य उधर के लिए योग्य हो सकता है।सबकी अपनी रोचकता है।शब्दों की अपनी रोचकता है।यहां की योग्यता पर सवाल उठाना गलत है।योग्यता की पहचान कार्यकुशलता है।कार्य करने के लिए योग्यता नहीं कर्मठता देखी जाती है।मानव अपनी कार्यकुशलता से अपनी योग्यता का परिचय देता है।अभ्यास से योग्यता का विकास होता है।
भले ही जैसा आप चाह रहे हों वैसी योग्यता उसके पास न हो पर इतनी तो योग्यता जरूर है जो आपके सामने प्रतिद्वंदी बनकर सामने खड़ा है।हमें उसकी योग्यता पर शंका नहीं है।शंका वो करें जो संकुचित है।मै योग्यता को बड़े विस्तार से जानता और मानता हूं।कागज के टुकड़े तभी सार्थक है जा आप उसके अनुकूल आचरण के द्वारा उसका रोपण,पलवान और संरक्षण करते हैं।योग्यता हो या न हो पर योग्य होना जरूरी है।योग्य होना ही तो योग्यता है।जो इस रहस्य को समझ लिया बस वही योग्य है।बाकी सब तो मोहमाया है।
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