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अपने जैसा पुत्र का वरदान देकर भगवान को स्वयं जन्म लेना पड़ा - आचार्य श्री त्रिपुष्कर जी महाराज

अपने जैसा पुत्र का वरदान देकर भगवान को स्वयं जन्म लेना पड़ा - आचार्य श्री त्रिपुष्कर जी महाराज

  • द्वारका मन्दिर में श्रीमदभागवत कथा के चौथे दिन मनाया गया श्री कृष्ण जन्मोत्सव

द्वारिका मंदिर आनन्दपुरी, बोरिंग केनाल रोड में आयोजित श्रीमद‌भागवत कथा के चौथे दिन रात्रि में व्यासपीठ पर आचार्य श्री त्रिपुष्कर जी महाराज का विधिवत व्यासपूजन यजमान सुनील कुमार तिवारी ने सपत्नीक किया। इसके साथ ही मंदिर के मुख्य पुजारी पं. मुकेश पाठक, नीरज कुमार सहित आयोजन से जुड़े श्रद्धालुओं ने भी किया
व्यास पूजन।
चौथे दिन की कथा प्रसंग का वर्णन करते हुए श्री त्रिपुष्कर जी महाराज ने भक्त ध्रुव, प्रहलाद और वामन अवतार की कथा सहित श्रीकृष्ण जन्म की कथा का प्रसंग वर्णन कर द्वापर का वह दृश्य साकार कर दिया l
भाद्रपद की कृष्ण पक्ष अष्टमी की मध्यरात्रि में भगवान का जिस समय जन्म हुआ उस समय सभी ग्रह शुभ और उच्च स्थिति में थे। वसुदेव जी देखते ही समझ गये कि पुत्र रूप में भगवान स्वयं आये हैं। वसुदेव भगवान के चरणों में अपना सिर शुका दिया और हाथ जोड़‌कर स्तुति करने लगे। माता देवकी भी पह‌चान गयी कि यह बालक ज्योति स्वरूप स्वयं भगवान विष्णु हैं। माँ देवकी ने भी विविध भावों में भगवान की स्तुति की।
भगवान ने माता देवकी से कहा पूर्वजन्म में आप प्रजापति पृश्नि और सुतपा थे जो इस जन्म में देवकी और वसुदेव हुए है। आप दोनों परम शुद्ध हृदय के थे lसंतान उत्पन्न करने की भावना से आप दोनो ने घोर तपस्या की l वर्षा, वायु, गर्मी, जाड़ा सभी समय तप करते रहे। सूखे पत्ते खाकर और वायु पीकर तप किये। उस समय में प्रसन्न होकर इसी रूप में मैंने आपको वरदान दिया था l आपने मेरे जैसा ही पुत्र माँगा था l मेरे जैसा कोई और नहीं था इसीलिए मुझे स्वयं आपके पुत्र रूप में जन्म लेना पड़ा l
इतना कहकर भगवान चुप हो गये और साधारण शिशु का रूप धारण कर लिया l उसी समय यशोदा माता के गर्भ से भगवान की शक्ति स्वरूपा कन्या का जन्म हुआ था l वसुदेव शिशु रूप भगवान को लेकर निकले l योगमाया की कृपा से बंदी गृह के दरखाने स्वतः खुल गये वसुदेव श्री कृष्ण को लेकर गोकुल में नन्द बाबा के घर गए l वहाँ अभी अचेत होकर सोये थे l वसुदेव जी ने किसी क़ो नहीं जगाया l कृष्ण को यशोदा के सेज पर सुला दिया और कन्या को. लेकर वापस बंदी गृह आ गए l
बच्चे के रोने की आवाज़ सुनकर द्वारपाल ने कंस को जाकर बताया l कंस उसी क्षण वहाँ आया और देवकी. के गोद से शिशु कन्या को लेकर निकला एक चट्टान के पास जाकर उस शिशु कन्या का पैर पकड़ कर जोर से पत्थर पर पटकना चाहा हाथ से छूटकर कन्या आकाश में चली गई l
कंस ने तुम्हारा अंत करने के लिए आवतार हो चुका है l
कृष्ण जन्म की कथा का मूल सन्देश यही है की भक्ति निश्छल और शुद्ध हृदय से हो तो भगवान स्वयं भक्त के घर आ जाते हैं l
कथा मध्यरात्रि तक जारी रहा पश्चात् आरती और प्रसाद वितरण किया गया l

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