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सेवा के नाम हो रहा सौदा

सेवा के नाम हो रहा सौदा

अरुण दिव्यांश
व्यवहार ने संस्कृति को रौंदा ,
सेवा के नाम हो रहा है सौदा ,
बदनाम हो रहा यह संस्कृति ,
कैसा मानसिक पला घरौंदा ।
सच्ची सेवा है अरमान कहाॅं ,
सहृदय सेवा है सम्मान कहाॅं ,
दान देने हेतु भी रिश्वत देना ,
बिन रिश्वत होते महान कहाॅं ।
बाहर से समीप अंदर से दूरी ,
मुॅंह में राम बगल में है छूरी ,
पूरे हों हर स्वार्थ ये हमारे ,
मानव का है नकली मजबूरी ।
मानव हो किन्तु मान कहाॅं है ,
तुम ज्ञानी हो पर ज्ञान कहाॅं है ,
सर्वश्रेष्ठ प्राणी में जन्म लिए ,
इसका तुमको भान कहाॅं है ।
जितने तेरे पास होते हैं दाम ,
वैसे ही मिलते तुझको काम ,
रिश्वत में बिकते आज सेवा ,
बिन रिश्वत आज कहाॅं ईनाम ।
ईमान से ही मिलता है ईनाम ,
बिन ईमान है ईनाम बदनाम ,
श्याम अंदर से है गोरा चिट्टा ,
गोरा चिट्टा अंदर से है श्याम ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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