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वृद्ध मन तू हार न मान

वृद्ध मन तू हार न मान

अरुण दिव्यांश
हे हमारे वृद्ध मन ,
तू हार नहीं मान ।
वरिष्ठ हो धरा पर ,
तू भार नहीं मान ।।
धरा का सुगंधित ,
न किसी से बंधित ।
जन जन तुम्हें प्यारे ,
तू ही रंजित अनुरंजित ।।
तुम्हीं तो हो अनुभव ,
तुम्हीं तो सच्चा ज्ञान ।
शेष तो बच्चे किशोर ,
शेष युवक होते नादान ।।
तुम्हीं तो हो वीर कुॅंअर ,
अस्सीवाॅं जवानी छाई ।
गोरों की औकात कहाॅं ,
न छल कर पाता भाई ।।
तू बुद्ध विवेक महावीर ,
तू ही तो युवा पथ हो ।
तू ही युवा पथ प्रदर्शक ,
तू ही तो पथ के रथ हो ।।


पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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