‘संस्कृत के बिना विश्व की कोई भाषा पूर्ण नहीं, सनातन की जड़ों से जुड़ी है यह देववाणी’

- बिहार संस्कृत विद्यापीठ में संस्कृत दिवस एवं रक्षाबंधन समारोह, संस्कृत को अनिवार्य विषय बनाने की उठी मांग
पटना। संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान, परंपरा, संस्कृति और सनातन चिंतन की आधारशिला है। विश्व की भाषाओं में संस्कृत के शब्दों की व्यापक उपस्थिति इसकी प्राचीनता और प्रभाव को प्रमाणित करती है। संस्कृत भाषा की संरचना, शब्द-संपदा, व्याकरणिक वैज्ञानिकता और साहित्यिक अभिव्यक्ति की विलक्षणता इसे दुनिया की अद्भुत भाषाओं में स्थान देती है। यह बातें बिहार संस्कृत विद्यापीठ के सभागार में आयोजित रक्षाबंधन एवं संस्कृत दिवस समारोह को संबोधित करते हुए विद्यापीठ के संचालक एवं प्राचार्य जगत नारायण शर्मा ने कहीं। समारोह की अध्यक्षता भी श्री शर्मा ने की।
उन्होंने कहा कि “विश्व में कोई ऐसी भाषा नहीं है, जिसमें संस्कृत के शब्द नहीं हैं।” संस्कृत के शब्दों का प्रभाव इतना व्यापक है कि भारतीय समाज में दैनिक जीवन से लेकर धार्मिक, दार्शनिक, वैज्ञानिक और साहित्यिक परंपराओं तक इसका प्रभाव दिखाई देता है। उन्होंने संस्कृत को भारतीय ज्ञान परंपरा की मूल भाषा बताते हुए कहा कि इसके अध्ययन के बिना वेद, उपनिषद, पुराण, दर्शन, आयुर्वेद, ज्योतिष और प्राचीन भारतीय साहित्य की गहराई को पूरी तरह समझना कठिन है।
बिल्कुल। इस बात को खबर में ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संदर्भ के रूप में जोड़ना अधिक प्रभावी रहेगा। हालांकि “चार वर्णों में पहला पर्व” जैसी बात को तथ्यात्मक दावे के रूप में रखने के बजाय आयोजकों के मत/मान्यता के रूप में लिखना बेहतर होगा। संशोधित अंश इस प्रकार है:
रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के स्नेह का पर्व नहीं, ज्ञान और संस्कार की परंपरा से भी जुड़ा
समारोह में वक्ताओं ने रक्षाबंधन के धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। जगत नारायण शर्मा ने कहा कि सनातन परंपरा में रक्षाबंधन का संबंध केवल भाई-बहन के पारिवारिक स्नेह तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह ज्ञान, संस्कार और ऋषि परंपरा से भी जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व है। परंपरागत मान्यताओं के अनुसार श्रावणी पूर्णिमा का यह पर्व विशेष रूप से ब्राह्मण समाज के लिए महत्वपूर्ण माना जाता रहा है और इसी अवसर पर यज्ञोपवीत, उपाकर्म तथा वेदाध्ययन से जुड़े संस्कारों की परंपरा रही है।
उन्होंने कहा कि रक्षाबंधन को सनातन परंपरा के प्रमुख पर्वों में प्रारंभिक और महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है तथा इसे विद्याभ्यास और संस्कार की शुरुआत से जोड़कर भी देखा जाता रहा है। प्राचीन गुरुकुल परंपरा में श्रावणी पूर्णिमा के अवसर पर वेदाध्ययन एवं शास्त्राध्ययन के नए सत्र का शुभारंभ किया जाता था। इस दृष्टि से यह पर्व केवल रक्षा-सूत्र बांधने का अवसर नहीं, बल्कि ऋषियों के प्रति श्रद्धा, गुरु-शिष्य परंपरा, ज्ञानार्जन और संस्कार के संकल्प का पर्व भी रहा है।
वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान समय में रक्षाबंधन का स्वरूप व्यापक हुआ है और यह भाई-बहन के प्रेम एवं पारिवारिक संबंधों का लोकप्रिय पर्व बन चुका है, लेकिन इसके पीछे निहित ऋषि परंपरा, वेदाध्ययन और संस्कार की प्राचीन भावना को भी नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि रक्षाबंधन को ब्राह्मणों का पारंपरिक पर्व भी माना जाता रहा है, क्योंकि श्रावणी उपाकर्म, यज्ञोपवीत परिवर्तन और वेदाध्ययन की परंपरा का इससे गहरा संबंध रहा है। इसी कारण संस्कृत दिवस और रक्षाबंधन का एक साथ आयोजन भारतीय ज्ञान एवं संस्कार परंपरा की दृष्टि से विशेष महत्व रखता है।
श्रावणी पूर्णिमा से जुड़ा है संस्कृत दिवस का इतिहास
श्री हृदयनारायण झा ने संस्कृत दिवस की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत में प्रत्येक वर्ष श्रावणी पूर्णिमा के पावन अवसर पर संस्कृत दिवस मनाया जाता है। यही दिन रक्षाबंधन का पर्व भी है। प्राचीन भारतीय परंपरा में श्रावणी पूर्णिमा को ऋषियों के स्मरण, उनके प्रति श्रद्धा और ज्ञान-परंपरा के प्रति समर्पण का पर्व माना जाता रहा है। चूंकि ऋषि संस्कृत साहित्य और भारतीय ज्ञान परंपरा के आदि स्रोत माने जाते हैं, इसलिए इस दिन को ऋषिपर्व एवं संस्कृत दिवस के रूप में मनाने की परंपरा विकसित हुई।
उन्होंने बताया कि राज्य और जिला स्तर पर संस्कृत दिवस के अवसर पर संस्कृत कवि सम्मेलन, लेखक गोष्ठी, भाषण प्रतियोगिता, श्लोकोच्चारण तथा विभिन्न साहित्यिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन आयोजनों से संस्कृत के विद्यार्थियों, कवियों और लेखकों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का मंच मिलता है।
1969 से देशभर में मनाया जा रहा संस्कृत दिवस
जगत नारायण शर्मा ने बताया कि वर्ष 1969 में भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के निर्देश के बाद केंद्रीय एवं राज्य स्तर पर संस्कृत दिवस मनाने की व्यवस्था शुरू हुई। इसके बाद से श्रावण पूर्णिमा के दिन देशभर में संस्कृत दिवस मनाया जाने लगा।
उन्होंने कहा कि श्रावण पूर्णिमा के चयन के पीछे प्राचीन भारतीय शिक्षा परंपरा का भी महत्वपूर्ण संबंध है। प्राचीन गुरुकुल व्यवस्था में इसी समय से नए शिक्षण सत्र का प्रारंभ माना जाता था। वेद एवं शास्त्रों के अध्ययन की शुरुआत भी इसी अवधि में होती थी। प्राचीन परंपरा में पौष पूर्णिमा से श्रावण पूर्णिमा तक अध्ययन में विराम रहता था और इसके बाद पुनः अध्ययन आरंभ किया जाता था। आज भी अनेक गुरुकुलों में श्रावण पूर्णिमा के अवसर पर वेदाध्ययन एवं संस्कृत शिक्षा का विशेष प्रारंभ किया जाता है।
उन्होंने कहा कि संस्कृत के प्रति रुचि केवल भारत तक सीमित नहीं है। विदेशों में भी संस्कृत भाषा, साहित्य और भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्ययन को लेकर उत्साह बढ़ रहा है। संस्कृत उत्सवों और शैक्षिक कार्यक्रमों के माध्यम से इस प्राचीन भाषा के अध्ययन को वैश्विक स्तर पर भी प्रोत्साहन मिल रहा है।
‘संस्कृत के इतिहास और साहित्य को छिपाने का प्रयास हुआ’
समारोह में हृदयनारायण झा ने कहा कि संस्कृत के इतिहास और साहित्य का जितना व्यापक अध्ययन और प्रचार-प्रसार होना चाहिए था, उतना नहीं हो पाया। उन्होंने आरोप लगाया कि “संस्कृत के इतिहास और साहित्य को इसलिए छुपा दिया गया ताकि सनातन को बकवास साबित किया जा सके।”
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति को समझने के लिए संस्कृत साहित्य का अध्ययन आवश्यक है। वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत, दर्शन और विभिन्न शास्त्रों में भारतीय चिंतन की विशाल परंपरा सुरक्षित है। इसलिए संस्कृत को केवल धार्मिक भाषा मानने के बजाय ज्ञान-विज्ञान और साहित्य की समृद्ध भाषा के रूप में नई पीढ़ी के सामने प्रस्तुत करने की आवश्यकता है।
संस्कृत की शब्द-रचना और साहित्यिक कौशल के दिए गए उदाहरण
समारोह में संस्कृत की अद्भुत साहित्यिक एवं भाषायी क्षमता को समझाने के लिए अनेक उदाहरण भी प्रस्तुत किए गए। वक्ताओं ने कहा कि संस्कृत भाषा की विशेषता केवल इसकी प्राचीनता नहीं, बल्कि इसकी अद्भुत शब्द-संरचना, व्याकरण और साहित्यिक प्रयोगों में भी दिखाई देती है।
इस दौरान अंग्रेजी के प्रसिद्ध वाक्य “A Quick Brown Fox Jumps Over The Lazy Dog” का उदाहरण देते हुए बताया गया कि इसका प्रयोग अंग्रेजी के सभी अक्षरों को एक वाक्य में प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है। इसके बाद संस्कृत में वर्णों के विशिष्ट प्रयोग के उदाहरण प्रस्तुत किए गए—
“कः खगी घाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोटौठीडढणः।
तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोऽरिल्वाशिषां सह।।’’
वक्ताओं ने इसे संस्कृत की वर्ण-विन्यास क्षमता का उदाहरण बताते हुए कहा कि संस्कृत साहित्य में वर्णों के क्रमबद्ध और कलात्मक प्रयोग के अनेक अद्भुत उदाहरण मिलते हैं।
केवल दो अक्षरों से रचा गया अद्भुत श्लोक
संस्कृत साहित्य की रचनात्मक क्षमता का उल्लेख करते हुए महाकवि माघ के शिशुपालवधम् का उदाहरण दिया गया। बताया गया कि महाकवि माघ ने केवल ‘भ’ और ‘र’ जैसे अक्षरों के प्रयोग से अत्यंत जटिल श्लोक की रचना की—
“भूरिभिर्भारिभिर्भीभीराभूभारैरभिरेभिरे।
भेरीरेभिभिरभ्राभैरूभीरूभिरिभैरिभाः।।’’
इसी प्रकार महाकवि भारवि के किरातार्जुनीयम् से ‘न’ ध्वनि की पुनरावृत्ति वाला श्लोक प्रस्तुत किया गया—
“न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नाना नना ननु।
नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नन्नुनन्नुनुत्।।’’
वक्ताओं ने कहा कि इस प्रकार की रचनाएं संस्कृत कवियों की भाषायी दक्षता, छंदज्ञान और अलंकारिक कौशल का परिचय कराती हैं।
महायमक और एकाक्षरी श्लोकों से संस्कृत की विलक्षणता उजागर
समारोह में महायमक अलंकार का भी उदाहरण प्रस्तुत किया गया। वक्ताओं ने बताया कि संस्कृत साहित्य में ऐसे प्रयोग मिलते हैं, जहां समान शब्दों या पदों की पुनरावृत्ति के बावजूद उनके अर्थ अलग-अलग होते हैं। इसके उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया—
“विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणाः।
विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणाः।।’’
इसके अलावा महाकवि माघ के शिशुपालवध से एकाक्षरी श्लोक का उदाहरण भी दिया गया—
“दाददो दुद्ददुद्दादी दाददो दूददीददोः।
दुद्दादं दददे दुद्दे दादाददददोऽददः।।’’
वक्ताओं ने कहा कि संस्कृत के कवियों ने भाषा के अक्षरों, ध्वनियों, शब्दों और अर्थों के साथ जिस प्रकार के प्रयोग किए, वे भारतीय काव्य परंपरा की असाधारण रचनात्मकता को प्रदर्शित करते हैं।
विलोम काव्य की परंपरा भी संस्कृत की विशेष पहचान
संस्कृत साहित्य में विलोम काव्य की परंपरा का उल्लेख करते हुए एक अन्य उदाहरण प्रस्तुत किया गया—
“वारणागगभीरा सा साराभीगगणारवा।
कारितारिवधा सेना नासेधा वारितारिका।।’’
इसी क्रम में रामकथा और कृष्णकथा से संबंधित विलोम पाठ का उदाहरण भी रखा गया। वक्ताओं ने कहा कि संस्कृत की संरचना और व्याकरणिक क्षमता ने कवियों को ऐसे प्रयोग करने की सुविधा दी, जिनमें एक ही रचना को अलग-अलग दिशाओं में पढ़कर अलग-अलग अर्थों की व्याख्या की जा सकती है।
‘बच्चों को संस्कृत साहित्य का चमत्कार दिखाने की जरूरत’
समारोह में वक्ताओं ने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि संस्कृत को केवल परीक्षा का विषय न बनाकर ज्ञान, संस्कृति और वैज्ञानिक चिंतन की भाषा के रूप में नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए। बच्चों को संस्कृत साहित्य की समृद्ध परंपरा से परिचित कराया जाए ताकि वे वेद, उपनिषद, पुराण, दर्शन, आयुर्वेद, ज्योतिष, गणित तथा भारतीय ज्ञान-विज्ञान की प्राचीन परंपराओं को समझ सकें।
वक्ताओं ने संस्कृत के अध्ययन को विद्यालयी शिक्षा में और अधिक प्रोत्साहित करने तथा संस्कृत को अनिवार्य विषय बनाए जाने की आवश्यकता पर बल दिया। उनका कहना था कि अपनी प्राचीन भाषायी और सांस्कृतिक विरासत से नई पीढ़ी को जोड़ना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
समारोह के दौरान संस्कृत भाषा की महत्ता, भारतीय संस्कृति में उसकी भूमिका और वर्तमान समय में उसके संरक्षण एवं संवर्धन को लेकर विस्तृत चर्चा हुई। कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने संस्कृत के प्रचार-प्रसार तथा युवा पीढ़ी को इससे जोड़ने के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता जताई।
इनकी रही प्रमुख सहभागिता
कार्यक्रम में विद्यापीठ से जुड़े मनोज कुमार, सुभाष तिवारी, पुरुषोत्तम शर्मा, गणेश शर्मा, हेमकांत मिश्र, कविन्द्र कुमार शर्मा, वंदना कुमारी, विश्वनाथ पाण्डेय, पंचानंद पाण्डेय, सीमाराम राय, डॉ. कमलदेव नारायण शुक्ल, देवेन्द्र शर्मा एवं हृदयनारायण झा सहित अनेक लोगों ने अपने विचार रखे।
समारोह का समापन संस्कृत भाषा एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण, संवर्धन और नई पीढ़ी तक उसके व्यापक प्रसार के संकल्प के साथ हुआ।
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