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जो है शेष, वही है विशेष

जो है शेष, वही है विशेष

कुमार महेंद्र
विगत हुआ जो कालखंड,
धूलि में अब लीन है।
जो वर्तमान सम्मुख खड़ा,
वही चेतन, नवीन है।
अश्रु-सिंधु में बहा दो,
मन का सारा क्लेश।
जो है शेष, वही है विशेष।।


भग्न हुए जो स्वप्न कभी,
थे शायद एक कल्पना।
सत्य वही जो शेष रहा,
उससे नव हो सृजना।
पतझड़ के वे पर्ण झरे,
ऋतु का यही उपदेश।
जो है शेष, वही है विशेष।।


अंत कहाँ होता जीवन में,
जब तक सृजन की आस है।
ढलती हर साँझ के भीतर,
भोर का नव विश्वास है।
रिक्त शून्य को मत निहारो,
जागृत कर दो नव उन्मेष।
जो है शेष, वही है विशेष।।


जो बीत गया, वह स्वप्न हुआ,
जो शेष रहा, आधार बने।
बुझते दीपों की राखों से,
नव दीपों के हार बने।
टूटे तारों से भी जग में,
जगमग हो नव परिवेश।
जो है शेष, वही है विशेष।।


हर पल की मधुरिम गंध को,
अब हृदय से तुम थाम लो।
शेष बचे इस जीवन-पुष्प से,
सौरभ का रसपान लो।
बह गया जो दूर सिंधु था,
मेघ बरसाएँ नव संदेश।
जो है शेष, वही है विशेष।।


नहीं शोक उस बीते कल का,
नहीं समय से कोई द्वेष।
आज मिला जो जीवन हमको,
वही हमारा परम विशेष।
जो बचा, वही अवसर है,
वही खुशियों का प्रदेश।
जो है शेष, वही है विशेष।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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