राखी आज भी अधूरी है
डॉ. राकेश दत्त मिश्र
कुछ रिश्ते चले जाते हैं, लेकिन उनके जाने के बाद भी हमारी जिंदगी में उनका इंतजार खत्म नहीं होता।
रक्षाबंधन का त्योहार आता है तो मन में बचपन की न जाने कितनी स्मृतियाँ जाग उठती हैं। बाजारों में राखियाँ सजी हैं, बहनें भाइयों की कलाई सजाने की तैयारी कर रही हैं, घरों में मिठाइयाँ बन रही हैं और हर तरफ भाई-बहन के प्रेम का उत्सव दिखाई दे रहा है।
लेकिन मेरे लिए रक्षाबंधन अब केवल एक त्योहार नहीं रहा।
यह एक ऐसी तारीख है, जो हर वर्ष मेरे भीतर दबे हुए किसी पुराने दर्द को फिर से जगा देती है।
मुझे याद आती हैं मेरी बड़ी बहन शशिप्रभा।
वह मुझसे लगभग दस-बारह वर्ष बड़ी थीं। मेरे लिए वह सिर्फ बड़ी बहन नहीं थीं, बल्कि स्नेह, ममता और सुरक्षा की वह छाया थीं, जिसके नीचे बचपन ने अपना बहुत सा समय बिताया था।
फिर आया 5 अगस्त 2010।
रक्षाबंधन के ठीक पहले वह हम सबको हमेशा के लिए छोड़कर चली गईं।
उस दिन के बाद से मेरी राखी अधूरी हो गई।
सोलह वर्ष बीत गए।
समय चलता रहा।
त्योहार आते रहे।
राखियाँ बंधती रहीं।
लेकिन मेरी स्मृतियों में वह दिन वहीं ठहरा हुआ है।
कभी-कभी लगता है कि समय ने मेरे जीवन से एक रिश्ता नहीं छीना, बल्कि मेरे बचपन का एक हिस्सा ही छीन लिया।
हर रक्षाबंधन पर मन पूछता है,
“दीदी, आप होतीं तो आज मेरी कलाई पर राखी कौन बाँधता?”
और फिर मन खुद ही चुप हो जाता है।
लेकिन इस बार की राखी…
इस बार की राखी ने तो मेरे जीवन को और भी सूना कर दिया है।
क्योंकि अभी पिछले महीने ही मेरी जीवनसंगिनी सुनीता भी मुझे छोड़कर चली गईं।
27 जुलाई 2026।
यह तारीख मेरे जीवन की दूसरी ऐसी तारीख बन गई, जिसे मैं शायद कभी भूल नहीं पाऊँगा।
एक तरफ सोलह वर्ष पुरानी बहन की याद।
दूसरी तरफ अभी-अभी खोई हुई पत्नी का दर्द।
एक रिश्ता जिसने बचपन को सहारा दिया था, वह चला गया।
और दूसरा रिश्ता जिसने जीवन की यात्रा में साथ दिया था, वह भी चला गया।
आज जब रक्षाबंधन सामने है तो मन में एक अजीब सा खालीपन है।
पहले लगता था कि राखी अधूरी है क्योंकि दीदी नहीं हैं।
आज लगता है कि जैसे पूरा घर ही अधूरा हो गया है।
सुनीता के जाने का दर्द अभी इतना ताजा है कि शब्द भी उसे व्यक्त करने में असमर्थ हैं।
वह जीवन की साथी थीं।
सुख-दुःख की सहभागी थीं।
मेरी दिनचर्या का हिस्सा थीं।
मेरी चिंताओं की साक्षी थीं।
और अब अचानक सब कुछ बदल गया।
कमरे वही हैं।
घर वही है।
सामान वही है।
यादें वही हैं।
लेकिन जिसके होने से घर, घर लगता था,वह नहीं है।
कभी-कभी मन सचमुच पूछ बैठता है,
“क्या सारे दुःख सहने के लिए मैं ही बचा था?”
क्या नियति ने मेरे हिस्से में ही इतनी परीक्षाएँ लिखी थीं?
पहले बड़ी बहन को खोया।
और सोलह वर्ष बाद जीवनसंगिनी को भी खो दिया।
क्या यह जीवन की कोई परीक्षा है?
या यह केवल नियति की वह कठोर सच्चाई है, जिसे मन स्वीकार करना नहीं चाहता?
इन सवालों का उत्तर मेरे पास नहीं है।
शायद किसी के पास नहीं है।
लेकिन इतना जरूर जानता हूँ कि मनुष्य बाहर से कितना भी मजबूत दिखाई दे, भीतर से वह कभी-कभी बहुत अकेला हो जाता है।
मैं भी आज उसी अकेलेपन से गुजर रहा हूँ।
लोग कहते हैं—समय सब ठीक कर देता है।
लेकिन अब मुझे लगता है कि समय सब ठीक नहीं करता।
समय केवल हमें दर्द के साथ जीना सिखाता है।
सोलह वर्ष पहले शशिप्रभा दीदी के जाने के बाद मैंने यही सीखा था।
और अब सुनीता के जाने के बाद फिर वही पाठ सामने है।
फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार दर्द बहुत गहरा है।
क्योंकि एक बहन चली गई थी, जिसकी राखी मेरी कलाई पर बंधती थी।
और अब वह पत्नी चली गई है, जिसके साथ मैंने जीवन की राह बाँटी थी।
एक ने मेरे बचपन को सूना किया।
दूसरी ने मेरे वर्तमान को।
और भविष्य?
वह अब प्रश्न बनकर सामने खड़ा है।
फिर भी शायद जीवन का अर्थ यही है,टूटकर भी चलते रहना।
आँखों में आँसू हों, फिर भी सुबह उठना।
दिल में खालीपन हो, फिर भी अपने लोगों के बीच मुस्कुराने की कोशिश करना।
और उन लोगों की स्मृतियों को अपने भीतर जीवित रखना, जिन्हें हम वापस नहीं ला सकते।
आज इस रक्षाबंधन पर मैं अपनी बहन शशिप्रभा को याद कर रहा हूँ।
और उसी के साथ अपनी जीवनसंगिनी सुनीता को भी।
दोनों मेरे जीवन की अलग-अलग यात्राओं की साथी थीं।
एक ने भाई के रूप में मुझे अपना स्नेह दिया।
दूसरी ने पत्नी बनकर जीवन का साथ दिया।
आज दोनों नहीं हैं।
बस उनकी यादें हैं।
और मैं हूँ।
शायद इसलिए आज मन फिर पूछता है,
“क्या सभी दुःख सहने के लिए मैं ही था?”
शायद ईश्वर का उत्तर कभी न मिले।
शायद नियति का रहस्य कभी समझ में न आए।
लेकिन मैं इतना जरूर चाहता हूँ कि मेरे भीतर इतनी शक्ति बनी रहे कि मैं अपने प्रियजनों की स्मृतियों को बोझ बनाकर नहीं, अपनी शक्ति बनाकर जी सकूँ।
दीदी शशिप्रभा,
आप जहाँ भी हों, मेरी राखी आज भी आपके नाम है।
और सुनीता,
तुम जहाँ भी हो, तुम्हारी स्मृतियाँ मेरे जीवन की अंतिम साँस तक मेरे साथ रहेंगी।
इस बार रक्षाबंधन पर मेरी कलाई शायद किसी धागे से नहीं, दो बिछुड़े हुए रिश्तों की याद से बंधी होगी।
एक राखी की याद,
शशिप्रभा दीदी की।
और एक जीवन की याद,
सुनीता की।
दीदी, आपको गए सोलह वर्ष हो गए।
सुनीता, तुम्हें गए अभी एक महीना भी पूरा नहीं हुआ।
एक ने मेरी राखी अधूरी की,
दूसरी ने मेरा जीवन।
फिर भी मैं जी रहा हूँ।
शायद इसलिए नहीं कि दर्द कम है,
बल्कि इसलिए कि उनकी यादों को अपने भीतर जीवित रखना भी अब मेरे जीवन का एक दायित्व है।
राखी फिर आएगी।
सावन फिर आएगा।
समय फिर आगे बढ़ेगा।
लेकिन मेरी कलाई पर बंधी हर राखी के साथ
शशिप्रभा दीदी की याद और
मेरे हृदय में सुनीता की कमी
हमेशा मेरे साथ रहेगी।
इस बार की राखी सचमुच बहुत सूनी है।
डॉ. राकेश दत्त मिश्र
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