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इस बार की राखी सूनी है

इस बार की राखी सूनी है

डॉ. राकेश दत्त मिश्र
राखी फिर से आई है,
पर कलाई कुछ सूनी है,
बहना तुम बिन सोलह सावन,
हर खुशियाँ अधूरी है।

याद तुम्हारी आती है,
आँखें नम हो जाती हैं,
पाँच अगस्त की वो तारीख,
आज भी दिल दुखाती है।

शशिप्रभा दीदी तुम थीं,
स्नेह भरी एक छाँव,
तुम थीं तो लगता था जैसे,
अपना है यह गाँव।

राखी के बस कुछ दिन पहले,
तुम हमसे दूर चली गईं,
एक धागा तो रह गया,
पर बाँधने वाली चली गईं।

सोलह वर्ष गुजर गए लेकिन,
याद तुम्हारी जाती नहीं,
कितनी भीड़ हो दुनिया में,
तन्हाई कम होती नहीं।

फिर इस वर्ष नियति ने,
एक और घाव दिया,
जिसे अपना जीवन माना,
उसने भी साथ छोड़ दिया।

सुनीता… तुम भी चली गईं,
मुझे अकेला छोड़कर,
जीवन की इस कठिन डगर पर,
मेरा हाथ छोड़कर।

अभी तो दीदी की यादों से,
मन संभल भी न पाया था,
तभी समय ने जीवन से,
एक और दीप बुझाया था।

एक ने बचपन सूना कर दिया,
एक ने जीवन का साथ,
एक राखी छीन गई मुझसे,
एक ने छीन लिया हाथ।

कभी-कभी मन पूछता है,
आखिर मेरी ही क्यों बारी?
क्या सारे दुःख सहने को ही,
मेरी थी यह जिम्मेदारी?

क्या मैं ही इतना मजबूत था,
कि सब कुछ सह जाऊँगा?
अपनों को खोते-खोते भी,
क्या फिर मुस्कुराऊँगा?

ईश्वर! मुझसे मत पूछो,
अब दर्द कितना बाकी है,
हँसता हूँ दुनिया के आगे,
अंदर आँखें रोती हैं।

कुछ रिश्ते मरते नहीं हैं,
बस आँखों से ओझल होते हैं,
वे हर धड़कन में रहते हैं,
हर साँस में शामिल होते हैं।

दीदी, जब भी राखी आए,
तुम्हें पुकारूँगा मैं,
सूनी कलाई देखकर फिर,
चुपचाप निहारूँगा मैं।

और सुनीता, तुम्हारी यादें,
मेरे साथ रहेंगी,
मेरे जीवन की हर शाम में,
तुम बनकर दीप जलेंगी।

तुम दोनों अब साथ नहीं हो,
फिर भी साथ हो मेरे,
एक मेरी राखी में रहती,
एक मेरे हर श्वास में बसेरे।

राखी फिर हर साल आएगी,
सावन फिर मुस्काएगा,
लेकिन मेरे मन का आँगन,
तुम बिन कब भर पाएगा?

दीदी की राखी अधूरी है,
सुनीता बिन जीवन सूना है,
इस बार मेरे हिस्से में,
बस यादों का कोना है।

फिर भी जीना होगा मुझको,
तुम दोनों की याद लिए,
दर्द छिपाकर होंठों पर,
थोड़ी सी मुस्कान लिए।

क्योंकि तुम दोनों ने सिखलाया,

रिश्ते कभी नहीं मरते हैं,
लोग चले जाते हैं लेकिन,
प्रेम हमेशा रहते हैं।

राखी फिर से आई है,
पर कलाई आज भी सूनी है,
शशिप्रभा दीदी बिन राखी,
सुनीता बिन जिंदगी अधूरी है। 
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