मेले की भीड़ में भी
जब हो उदास ज़िन्दगीतब
अन्तर्मन से बात करो
और बता दो
कभी तन्हां नहीं होती
ज़िन्दगी।
सवालों और जवाबों
की दुनिया
उठापटक उहापोह की दुनिया
मृगतृष्णा सी भटकती दुनिया
बस इतनी नहीं होती जिन्दगी।
ज़िन्दगी को दिखा दो
मानवता
और
दानवता का फर्क
ज़िन्दगी को समझा दो
अपने परायों की पहचान
उदासी के आलम में
खुश रहने की शान
ज़िन्दगी को बता दो।
और तब देखो
उजडे आशियानों
टूटते बिखरते रिश्तों
ठूँठ होते वृक्षों
अथवा
मरू भूमि में भी
सौंदर्य बोध
नजर आ जायेगा
जीवन
मधुरिम लगेगा
ज़िन्दगी में सब
श्रेष्ठतम दिखायेगा।
यह सब नजरिए की बात है
बस नजरिया बदलिए
उदास लम्हों में
अन्तर्मन में
ख़ुशियाँ समेटिये।
विकल्पों के मकड़जाल
काट डालिए उन्हें
और तलाशिए
खुले गगन में
उड़ते चहचहाते
परिंदों को
फूलों कलियों पर
अठखेलियाँ करते
पतंगों को
फूलों का रस चुराती
तितलियों
कली कली पर धूम मचाते
भौरों को।
बस
जी हाँ बस
यही है ज़िन्दगी
मुस्कुराती
खिलखिलाती
उदासी लम्हों को
धता बताती।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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