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रविवार, मस्त मलंग सदाबहार

रविवार, मस्त मलंग सदाबहार

कुमार महेंद्र
भाग-दौड़ की इस दुनिया में,
खुशियों का संदेशा लाता।
सप्ताह भर की थकान मिटाकर,
मन में नव उल्लास जगाता।
बिन अलार्म के भोर जगाए,
रग-रग में नव उमंग संचार।
रविवार, मस्त मलंग सदाबहार।।


मनमौजी पथिक-सा आता,
फैलाकर अपनी खुली बाहें।
अपनों के संग हँसी ठिठोली,
महक उठें घर की सब राहें।
चाय की प्याली में घुलता,
अपनों का स्नेह-प्यार।
रविवार, मस्त मलंग सदाबहार।।


बचपन की यादें ले आता,
गलियों में फिर शोर मचाता।
मित्रों की गोष्ठी जब सजती,
हर चेहरा बचपन बन जाता।
गिल्ली-डंडा, खेल-कूद की,
मन में जागे फिर वही बहार।
रविवार, मस्त मलंग सदाबहार।।


न कोई जल्दी, न कोई चिंता,
न दफ्तर जाने की लाचारी।
कुछ पल खुद के नाम लिखे हैं,
कुछ पल अपनों संग यारी।
मन के सूने आँगन में फिर,
खिल उठतीं खुशियों की फुहार।
रविवार, मस्त मलंग सदाबहार।।


सुबह सुनहरी, दोपहर सुहानी,
शाम छटा अति मनमोहक।
कभी किताबों में मन रमता,
कभी सुनें किस्से रोचक।
ढलता सूरज कहता हमसे,
कल के लिए हो जाओ तैयार।
रविवार, मस्त मलंग सदाबहार।।


सप्ताह नया, संकल्प नए हों,
नई उमंगें, नए उजाले।
बीते पल से सीखें लेकर,
आगे बढ़ने के हों हौसले।
हर रविवार यही सिखाए—
जीवन में रखिए हँसी अपार।
रविवार, मस्त मलंग सदाबहार।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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