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"विवेकपूर्ण करुणा"

"विवेकपूर्ण करुणा"

पंकज शर्मा
करुणा केवल द्रवित होना,
पीड़ा पर आँसू भरना नहीं;
जो हाथ उठे किसी को थामे,
वह सच्चा सहारा बनना है।


दया यदि केवल दुःख हर ले,
पीड़ा फिर लौटेगी द्वार;
श्रेष्ठ करुणा वह, जो भीतर
जगा सके जीने का आधार।


गिरते को थामना सहज मनुजता,
पर उसे स्वयं चलना सिखाना
करुणा की पूर्णता है।


हर घाव पर मरहम रखना
कारण को मिटाता नहीं;
हर संकट से बचाना
जीवन का अर्थ सिखाता नहीं।


कभी सहारा देना पड़ता,
कभी अकेला छोड़ना भी;
करुणा बाहें फैलाती,
कभी स्वयं से लड़ना भी।


जो सहायता आत्मबल हर ले,
वह उपकार नहीं—बंधन है;
जो स्वाभिमान बचाए रखे,
वही करुणा का अभिनंदन है।


करुणा में अहंकार न घुले;
देने वाला स्वयं न बढ़े,
लेने वाला भी छोटा न हो।


पीड़ा देखकर बहना मानवता है;
पीड़ा के मूल तक पहुँचना
विवेकपूर्ण करुणा है।


कभी दुःख हर लेना,
कभी दुःख सहना सिखलाना;
कभी दीपक बन जाना,
कभी अपना दीप जलाना।


जीवन संरक्षण ही नहीं,
संघर्षों से निखरना भी है;
हर पग पर छाया देना
पथिक को सूर्य से डराना भी है।


अनुचित इच्छा को “हाँ” कहना
करुणा नहीं, लाचारी है।
सीमा खींचना भी करुणा है;
सत्य आत्मा की वाणी है।


करुणा वह, जिसमें ‘मैं’ घटता,
और ‘तुम’ का मान बचा रहता;
सहायता देकर भी दाता
अपने दान से दूर रहता।


करुणा रखो—दृष्टि जागृत,
हृदय द्रवित, विवेक प्रखर;
जहाँ सहारा मुक्ति बने,
जहाँ मौन भी हो हितकर।


करुणा की चरम परिणति
किसी को पास रखना नहीं—
बल्कि इतना समर्थ बनाना है
कि उसे फिर तुम्हारी आवश्यकता न रहे।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️"कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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