मुस्कुराकर चलना है
अरुण दिव्यांशखौलते तेल न तलना है ,
हॅंसी खुशी में पलना है ।
हर्ष आनंद की नईया में ,
मुस्कुरा कर चलना है ।।
आनंद नहीं होता क्रूर में ,
रिश्ते भी लगते हैं दूर में ।
क्रूरता घमंड का पहचान ,
ऑंख रहते चले सूर में ।।
दूसरों हेतु हमें फलना है ,
न किसी को छलना है ।
ऑंख रहते सूर हुए तो ,
आजीवन भुज मलना है ।।
जीवन यह बहुमूल्य है ,
पहचान जीवन का मोल ।
निज जीवन में झाॅंककर ,
स्वयं को देख ले तू तोल ।।
नहीं किसी से जलना है ,
जीवन इक दिन ढलना है ।
जी ले तू अपनों के लिए ,
तभी सृष्टि का ललना है ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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