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स्पर्श की अनुभूति को, अभिव्यक्ति बन जाने दो

(गुड टच और बैड टच की अवधारणा के संबंध में कुछ पंक्तियाँ सादर निवेदित हैं।)

स्पर्श की अनुभूति को, अभिव्यक्ति बन जाने दो

कुमार महेन्द्र
हर एक स्पर्श के भीतर,
छिपा हुआ है मर्म।
सुखद स्पर्श हो जीवन में,
या दे मन को कोई दर्द।
मन के सूक्ष्म संकेतों को,
मुखरित स्वर हो जाने दो।
स्पर्श की अनुभूति को, अभिव्यक्ति बन जाने दो।।


घर-परिवार, समाज-कार्यस्थल,
हर आचरण मर्यादित हो।
हर नारी-बालक की गरिमा,
सदा-सर्वदा सुरक्षित हो।
मौन नहीं अब रहना है,
सजग चेतना जगाने दो।
स्पर्श की अनुभूति को, अभिव्यक्ति बन जाने दो।।


परिचित हो अथवा अनजाना,
हर स्पर्श को परखना है।
मन यदि सहज न हो पाए,
तो खुलकर बात भी करना है।
माता-पिता, गुरु, अभिभावक,
विश्वास का दीप जलाने दो।
स्पर्श की अनुभूति को, अभिव्यक्ति बन जाने दो।।


अच्छे स्पर्श में स्नेह बहे,
ममता का मधुर प्रवाह।
बुरा स्पर्श मन को डराए,
भय जगाए भीतर अथाह।
असहजता को मौन न रखना,
साहस स्वर में आने दो।
स्पर्श की अनुभूति को, अभिव्यक्ति बन जाने दो।।


‘न’ कहना भी अधिकार तुम्हारा,
‘न’ की मर्यादा पहचानो।
कोई छुए अनुचित ढंग से,
तो चुप रहकर सहना न जानो।
डर, संकोच और रूढ़ि छोड़कर,
सत्य सामने आने दो।
स्पर्श की अनुभूति को, अभिव्यक्ति बन जाने दो।।


स्पर्श बने विश्वास का बंधन,
स्पर्श बने सम्मान।
हर तन-मन की गरिमा सुरक्षित,
हर जीवन का हो मान।
स्वच्छ-सुरक्षित सुंदर समाज की,
नव चेतना मुस्काने दो।
स्पर्श की अनुभूति को, अभिव्यक्ति बन जाने दो।।


कुमार महेन्द्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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