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आरक्षण के 80 वर्ष और सामान्य वर्ग का सवाल.

आरक्षण के 80 वर्ष और सामान्य वर्ग का सवाल. 

लेखक : डॉ. राकेश दत्त मिश्र
भारत में आरक्षण की व्यवस्था को लागू हुए कई दशक बीत चुके हैं। इस दौरान देश ने चंद्रमा तक पहुँचने से लेकर डिजिटल क्रांति तक अनेक उपलब्धियाँ हासिल कर लीं, लेकिन आरक्षण की राजनीति आज भी वहीं खड़ी है-बल्कि अब पहले से अधिक ताकतवर होकर। जब भी चुनाव आता है, जब भी सत्ता को सामाजिक समीकरण साधने की आवश्यकता होती है, जब भी कोई नेता अपने वोट बैंक को आश्वस्त करना चाहता है, तब एक घोषणा बड़े आत्मविश्वास के साथ सुनाई देती है- “मैं डंके की चोट पर कहता हूँ कि एससी, एसटी और अन्य आरक्षण कोई नहीं छीन सकता।” वाह! क्या आत्मविश्वास है! लेकिन इस वाक्य को यदि थोड़ा ध्यान से सुना जाए, तो इसके पीछे छिपा हुआ एक दूसरा प्रश्न भी सुनाई देता है। अगर आरक्षण कभी समाप्त नहीं होगा, तो क्या सामाजिक न्याय का अर्थ हमेशा के लिए समाज को अलग-अलग खानों में बाँटकर रखना है? और फिर एक और प्रश्न उठता है- इस देश में सामान्य वर्ग का भविष्य क्या है? नेता जी कहते हैं-“आरक्षण कोई नहीं छीन सकता।” लेकिन वे यह नहीं कहते कि प्रतिभा का अधिकार कौन सुरक्षित रखेगा? वे यह नहीं कहते कि गरीब सामान्य वर्ग के बच्चे का अधिकार कौन देखेगा? वे यह नहीं कहते कि जिस परिवार की आर्थिक स्थिति अत्यंत कमजोर है, लेकिन उसकी जाति आरक्षण की सूची में नहीं है, उसके बच्चे को अवसर की बराबरी कौन देगा? क्योंकि राजनीति में जाति दिखाई देती है, गरीबी नहीं। डंका किस बात का है? “डंके की चोट पर” कहना अपने आप में कोई समस्या नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब डंके की आवाज इतनी तेज हो जाए कि उसमें न्याय की आवाज दब जाए। यदि किसी नेता का संदेश यह है कि- “चिंता मत कीजिए, आपका आरक्षण हमेशा रहेगा।” तो सामान्य वर्ग के गरीब युवक को स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न पूछने का अधिकार है- “मेरी चिंता कौन करेगा?” उसे भी तो आश्वासन चाहिए। उसे भी कोई नेता डंके की चोट पर कहे- “गरीब हो तो तुम्हारा अधिकार कोई नहीं छीन सकता।” लेकिन ऐसा डंका चुनावी मैदान में कम ही सुनाई देता है। क्योंकि जाति एक संगठित राजनीतिक शक्ति है, जबकि गरीब व्यक्ति अक्सर सिर्फ गरीब होता है। आरक्षण साधन था या स्थायी व्यवस्था? आरक्षण की मूल भावना सामाजिक और ऐतिहासिक वंचना को दूर करना थी। यह बहस का विषय नहीं कि भारतीय समाज में लंबे समय तक अनेक समुदायों के साथ अन्याय और भेदभाव हुआ। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या किसी उपचार को हमेशा बीमारी का स्थायी रूप बना देना चाहिए? यदि कोई बच्चा जन्म से ही पिछड़ेपन का प्रमाणपत्र लेकर पैदा नहीं होता, तो फिर व्यवस्था को ऐसा क्यों नहीं बनाया जा सकता कि वास्तविक रूप से वंचित व्यक्ति को अवसर मिले और सक्षम व्यक्ति को उसकी योग्यता के आधार पर आगे बढ़ने का अवसर भी मिले? सवाल आरक्षण के अस्तित्व का ही नहीं है। सवाल है- आरक्षण की समीक्षा कौन करेगा? उसकी सफलता का मूल्यांकन कौन करेगा? उसका लाभ वास्तव में सबसे वंचित व्यक्ति तक पहुँच रहा है या नहीं, यह कौन देखेगा? और सबसे महत्वपूर्ण- क्या सामाजिक न्याय का अंतिम लक्ष्य ऐसी व्यवस्था बनाना नहीं होना चाहिए जिसमें आरक्षण की आवश्यकता धीरे-धीरे समाप्त हो जाए? अगर उत्तर “हाँ” है, तो फिर हर चुनाव में यह घोषणा क्यों की जाती है कि आरक्षण कभी समाप्त नहीं होगा? एक विचित्र राजनीतिक गणित हमारे लोकतंत्र का गणित भी अद्भुत है। नेता कहता है-“हम आरक्षण बचाएँगे।” तालियाँ बजती हैं। दूसरा नेता कहता है- “हम आरक्षण बढ़ाएँगे।” और ज्यादा तालियाँ बजती हैं। तीसरा नेता कहता है- “हम किसी को आरक्षण छीनने नहीं देंगे।” तालियों की आवाज और तेज हो जाती है। लेकिन कोई नेता खड़ा होकर यह कह दे- “हम ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनाएँगे कि आने वाली पीढ़ी को आरक्षण की आवश्यकता ही न पड़े।” तो शायद मंच पर कुछ क्षणों के लिए सन्नाटा छा जाए। क्योंकि यह घोषणा वोट नहीं, व्यवस्था बदलने का वादा होगी। और व्यवस्था बदलना राजनीति में सबसे कठिन काम है। सामान्य वर्ग से भी एक सवाल सामान्य वर्ग से भी यह पूछा जाना चाहिए कि क्या वह केवल शिकायत करेगा या अपने अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से आवाज भी उठाएगा? किसी समुदाय के अधिकार के विरुद्ध दूसरे समुदाय को खड़ा करना समाधान नहीं है। वास्तविक समाधान है- जाति के साथ आर्थिक और सामाजिक वंचना का वैज्ञानिक मूल्यांकन। जिसे सहायता चाहिए, उसे सहायता मिले। जिसे अवसर चाहिए, उसे अवसर मिले। जिसके साथ भेदभाव हुआ है, उसे संरक्षण मिले। लेकिन साथ ही उस व्यक्ति को भी अवसर मिले जो केवल इसलिए पीछे न रह जाए कि वह ऐसी जाति में पैदा हुआ जिसे राजनीति की भाषा में “सामान्य” कह दिया गया। गरीबी की कोई जाति नहीं होती। बेरोजगारी की कोई जाति नहीं होती। प्रतिभा की कोई जाति नहीं होती। भूख की भी कोई जाति नहीं होती। फिर अवसर की राजनीति में जाति ही अंतिम सत्य क्यों हो? डंके की चोट पर एक और घोषणा होनी चाहिए यदि हमारे नेता वास्तव में “डंके की चोट” पर बोलना चाहते हैं, तो उन्हें यह भी कहना चाहिए- “हम किसी गरीब का अधिकार नहीं छीनेंगे, चाहे वह किसी भी जाति का हो।” उन्हें कहना चाहिए- “हम ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनाएँगे जिसमें सरकारी स्कूल का गरीब बच्चा भी बड़े से बड़े निजी स्कूल के बच्चे से मुकाबला कर सके।” उन्हें कहना चाहिए- “हम रोजगार के अवसर बढ़ाएँगे, ताकि युवाओं को आरक्षण की सीट के लिए नहीं, अपनी योग्यता के लिए प्रतिस्पर्धा करनी पड़े।” और सबसे महत्वपूर्ण- “हम सामाजिक न्याय को राजनीतिक वोट बैंक नहीं, राष्ट्रीय नीति बनाएँगे।” यही असली डंका होगा। आखिर सामान्य वर्ग का अपराध क्या है? सबसे बड़ा व्यंग्य तो यह है कि “सामान्य वर्ग” शब्द सुनते ही ऐसा लगता है जैसे इस वर्ग में पैदा होने वाला प्रत्येक व्यक्ति जन्म से ही संपन्न, शिक्षित, सुरक्षित और विशेषाधिकार प्राप्त होता है। काश ऐसा होता! वास्तविकता यह है कि सामान्य वर्ग में भी गरीब हैं, किसान हैं, मजदूर हैं, बेरोजगार हैं, छोटे दुकानदार हैं और ऐसे परिवार हैं जिनके बच्चे फीस भरने के लिए संघर्ष करते हैं। लेकिन व्यवस्था उन्हें देखकर कह देती है- “आप सामान्य हैं।” अर्थात आप सामान्य हैं, इसलिए आपकी परेशानी भी सामान्य है! आप गरीब हैं तो अपनी गरीबी से लड़िए। आप बेरोजगार हैं तो अपनी बेरोजगारी से लड़िए। आपके बच्चे को अवसर नहीं मिला तो वह अपनी किस्मत से लड़ ले। और यदि वह पूछे कि सरकार मेरी मदद कब करेगी? तो लोकतंत्र का डंका बजता है- “आरक्षण कोई नहीं छीन सकता!” आरक्षण पर बहस केवल “आरक्षण रहे या जाए” की बहस नहीं होनी चाहिए। यह बहस इससे कहीं बड़ी है- हम कैसा भारत बनाना चाहते हैं? ऐसा भारत जहाँ जाति के आधार पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी राजनीतिक गणित चलता रहे? या ऐसा भारत जहाँ हर गरीब, हर वंचित और हर प्रतिभावान व्यक्ति को आगे बढ़ने का वास्तविक अवसर मिले? यदि आरक्षण की आवश्यकता आज भी है, तो उसे सामाजिक न्याय की दृष्टि से ईमानदारी से चलाइए। लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित कीजिए कि सामान्य वर्ग का गरीब नागरिक लोकतंत्र में अनाथ न हो जाए। क्योंकि लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं है कि बहुमत को खुश करने के लिए किसी दूसरे वर्ग को लगातार आश्वासन दिया जाए कि- “तुम्हारा अधिकार कोई नहीं छीन सकता।” लोकतंत्र का अर्थ यह है कि सरकार हर नागरिक से कह सके- “तुम्हारा अधिकार भी कोई नहीं छीन सकता।” और शायद जिस दिन कोई नेता यह बात डंके की चोट पर कहने का साहस करेगा, उस दिन भारतीय राजनीति में सचमुच सामाजिक न्याय का नया अध्याय शुरू होगा। तब डंका किसी जाति का नहीं होगा। डंका न्याय का होगा।
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