पुस्तक लोकार्पण एवं सम्मान से गूंजा साहित्यिक कुंभ
पुस्तक लोकार्पण एवं सम्मान से गूंजा साहित्यिक कुंभ

- हरिद्वार में साहित्य, अध्यात्म और गंगा संरक्षण का त्रिवेणी संगम; पाँच पुस्तकों का एक साथ लोकार्पण, साहित्यकारों एवं गंगा सेवियों का हुआ सम्मान
हरिद्वार, 30 अगस्त। तीर्थनगरी हरिद्वार में दो दिनों तक साहित्य, अध्यात्म, संस्कृति और गंगा संरक्षण की अविरल धारा बहती रही। अवधूत आश्रम परिसर में आयोजित द्वि-दिवसीय “संरक्षण सेवा संकल्प–दिव्य गंगा महोत्सव एवं साहित्यिक कुंभ-2026” का रविवार को भव्य समापन हुआ। पुस्तक लोकार्पण, साहित्यकारों के सम्मान और गंगा संरक्षण के संकल्प से परिपूर्ण इस आयोजन ने हरिद्वार की आध्यात्मिक धरती पर साहित्य और संस्कृति का एक अनूठा अध्याय जोड़ दिया। कार्यक्रम में बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली-एनसीआर और उत्तराखंड सहित विभिन्न क्षेत्रों से आए साहित्यकारों, इतिहासकारों, विद्वानों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाग लेकर ज्ञान, साहित्य और सेवा की परंपरा को सशक्त किया।
समापन समारोह का शुभारंभ प्रातः 10 बजे वैदिक मंत्रोच्चारण, माँ गंगा की वंदना और आध्यात्मिक वातावरण के बीच हुआ। मंच पर आचार्य कुल के राष्ट्रीय अध्यक्ष आचार्य डॉ. धर्मेन्द्र, वरिष्ठ साहित्यकार एवं इतिहासकार सत्येंद्र कुमार पाठक, दिव्य गंगा सेवा मिशन के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. शिवेश्वर पाण्डेय, जीविका भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रकाश बंधु तथा शाम्भवी पीठ, हरिद्वार के महामंडलेश्वर आनंद स्वरूप जी महाराज सहित अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।
हरिद्वार परिभ्रमण से हुआ था साहित्यिक कुंभ का आगाज

साहित्यिक कुंभ का शुभारंभ 29 अगस्त को हरिद्वार परिभ्रमण एवं ऐतिहासिक-धार्मिक स्थलों के अध्ययन से हुआ था। वरिष्ठ इतिहासकार एवं साहित्यकार सत्येंद्र कुमार पाठक के नेतृत्व में विद्वानों की टीम ने हर की पौड़ी, महाराजा अग्रसेन घाट, हंस घाट, कुशावर्त घाट, कनखल, मनसा देवी और चंडी देवी सहित हरिद्वार के प्रमुख धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थलों का गहन अध्ययन किया।
इस अध्ययन का उद्देश्य केवल तीर्थस्थलों का भ्रमण करना नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और साहित्यिक परंपराओं को समझना तथा गंगा संरक्षण के प्रति समाज में जागरूकता पैदा करना था। प्रतिभागियों ने गंगा के घाटों, तीर्थ परंपराओं और उनसे जुड़े सांस्कृतिक पक्षों पर विचार-विमर्श भी किया।

पाँच पुस्तकों का एक साथ लोकार्पण बना आकर्षण का केंद्र
समापन समारोह का सबसे प्रमुख आकर्षण पाँच पुस्तकों का एक साथ लोकार्पण रहा। आयोजन से जुड़े लोगों के अनुसार हरिद्वार में एक ही मंच से पाँच साहित्यिक कृतियों के सामूहिक लोकार्पण को विशेष उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।
“उमा वाणी” के लेखक नोएडा निवासी उमानाथ त्रिपाठी हैं। आध्यात्मिक कविताओं और भजनों के इस संग्रह में 51 रचनाएँ संकलित हैं। रचनाओं में जीवन-दर्शन, भक्ति, आध्यात्मिक चेतना और वेदांत के भावों को अभिव्यक्ति दी गई है। लेखक ने अपनी कृति को माँ सरस्वती की प्रेरणा से निकली वाणी बताया।
मुजफ्फरपुर, बिहार की साहित्यकार एवं स्वर्णिम कला केंद्र की अध्यक्षा डॉ. उषा किरण श्रीवास्तव की कृति “अंजुरी में पंखुरी” गंगा, प्रकृति, प्रेम और नारी मन की संवेदनाओं का काव्यात्मक संगम है। सरल भाषा और गहन भावबोध से युक्त यह कृति मानवीय संवेदनाओं को प्रकृति और आध्यात्मिकता से जोड़ती है।
“माँ तेरे जाने के बाद” की लेखिका डॉ. संगीता सागर, जो आचार्य कुल की बिहार उपाध्यक्ष हैं, ने अपनी कृति में मातृत्व, त्याग, संस्कार और माँ के वात्सल्य को केंद्र में रखा है। पुस्तक में माँ के आँचल की महिमा और उसके जीवन में महत्व का मार्मिक चित्रण किया गया है। यह कृति पाठकों को मातृ-स्मृतियों और भारतीय पारिवारिक संस्कारों से जोड़ती है।
हरियाणा के प्रसिद्ध कवि एवं साहित्यकार डॉ. त्रिलोक चंद फतेहपुरी की दो पुस्तकों “परिदर्पण–यात्रा संस्मरण” और “गीत वतन के” का भी लोकार्पण हुआ। “परिदर्पण” में लेखक के देश-विदेश के यात्रा अनुभवों को संस्मरणात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, जबकि “गीत वतन के” में राष्ट्रप्रेम, देशभक्ति और मातृभूमि के प्रति समर्पण की भावनाओं से ओत-प्रोत गीत संकलित हैं।
इन पाँचों पुस्तकों का संयुक्त लोकार्पण आचार्य डॉ. धर्मेन्द्र और वरिष्ठ इतिहासकार सत्येंद्र कुमार पाठक ने किया।
“पुस्तकें ही संस्कृति की गंगा हैं” : आचार्य डॉ. धर्मेन्द्र

लोकार्पण समारोह को संबोधित करते हुए आचार्य डॉ. धर्मेन्द्र ने कहा कि पुस्तकें किसी समाज की केवल साहित्यिक संपत्ति नहीं होतीं, बल्कि वे उसकी संस्कृति, विचार और संस्कारों की संवाहक होती हैं। उन्होंने कहा, “पुस्तकें ही संस्कृति की गंगा हैं। जैसे गंगा हिमालय से निकलकर पूरे भारत को पवित्र करती है, वैसे ही अच्छी पुस्तकें लेखक के हृदय से निकलकर समाज को संस्कारित करती हैं।”
उन्होंने लोकार्पित पुस्तकों को नारी शक्ति, मातृत्व, भक्ति और राष्ट्रभाव की त्रिवेणी बताते हुए कहा कि यह केवल पुस्तकों का लोकार्पण नहीं, बल्कि ज्ञान-गंगा का अवतरण है। उन्होंने साहित्यकारों से समाज में सकारात्मक चिंतन और भारतीय संस्कृति के संरक्षण की भूमिका को और मजबूत करने का आह्वान किया।
“हरिद्वार ज्ञान परंपरा की राजधानी” : सत्येंद्र कुमार पाठक
वरिष्ठ साहित्यकार एवं इतिहासकार सत्येंद्र कुमार पाठक ने कहा कि हरिद्वार को केवल धार्मिक आस्था और गंगा स्नान की नगरी के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा, साधना, साहित्य और संस्कृति की भी महत्वपूर्ण भूमि है। गुरुकुल कांगड़ी से लेकर वर्तमान समय तक हरिद्वार ने ज्ञान और साहित्य की निरंतर धारा को आगे बढ़ाया है।
उन्होंने कहा कि “उमा वाणी में वेदों की गूंज है, अंजुरी में पंखुरी में गंगा की निर्मलता है और ‘माँ तेरे जाने के बाद’ में भारतीय संस्कारों की सुगंध है। ऐसी कृतियाँ हिंदी साहित्य को समृद्ध करने के साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक धरोहर बनती हैं।”
त्रिलोक चंद फतेहपुरी को ‘विद्या सागर’ की मानद उपाधि
समारोह में काशी हिन्दी विद्यापीठ की ओर से वरिष्ठ साहित्यकार एवं कवि डॉ. त्रिलोक चंद फतेहपुरी को साहित्यिक एवं रचनात्मक योगदान के लिए ‘विद्या सागर’ की मानद उपाधि से अलंकृत किया गया। इस सम्मान को साहित्य जगत में उनके योगदान की महत्वपूर्ण स्वीकृति के रूप में देखा गया।
सत्येंद्र कुमार पाठक को दो राष्ट्रीय सम्मान
समारोह का एक अन्य प्रमुख आकर्षण वरिष्ठ इतिहासकार एवं साहित्यकार सत्येंद्र कुमार पाठक का सम्मान रहा। साहित्य, इतिहास और गंगा संरक्षण के क्षेत्र में लगभग दो दशकों से निस्वार्थ भाव से किए जा रहे उनके कार्यों के लिए उन्हें दो राष्ट्रीय सम्मानों से विभूषित किया गया।
दिव्य गंगा सेवी सम्मान-2026 दिव्य गंगा सेवा मिशन की ओर से प्रदान किया गया। यह सम्मान शाम्भवी पीठ, हरिद्वार के महामंडलेश्वर आनंद स्वरूप जी महाराज एवं मिशन के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. शिवेश्वर पाण्डेय ने संयुक्त रूप से प्रदान किया। यह सम्मान विशेष रूप से हरिद्वार के पंचतीर्थों एवं प्रमुख घाटों के उनके शोधपूर्ण अध्ययन तथा गंगा संस्कृति के संरक्षण के लिए किए गए कार्यों के लिए दिया गया।
इसके अतिरिक्त दिव्य ग्राम टुडे प्रकाशन समूह की ओर से साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें ‘टीजीटी साहित्य भूषण सम्मान-2026’ से सम्मानित किया गया। सम्मान स्वरूप उन्हें स्मृति चिह्न, प्रशस्ति पत्र और माँ गंगा की प्रतिमा भेंट की गई।
“सत्येंद्र पाठक संस्कृति को जीते हैं” : महामंडलेश्वर आनंद स्वरूप
महामंडलेश्वर आनंद स्वरूप जी महाराज ने सत्येंद्र कुमार पाठक के कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि गंगा और भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए समर्पित इतिहासकार समाज के सच्चे प्रहरी हैं। उन्होंने कहा, “सत्येंद्र पाठक जी जैसे इतिहासकार हमारी गंगा और संस्कृति के सच्चे प्रहरी हैं। वह केवल लिखते नहीं, संस्कृति को जीते हैं।”
उन्होंने कहा कि साहित्य और संस्कृति के माध्यम से समाज में गंगा संरक्षण का संदेश पहुँचाना आज की आवश्यकता है। गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक चेतना, आस्था और सभ्यता की जीवनधारा है।
महिला साहित्यकारों और रचनाकारों का भी हुआ सम्मान
समारोह में डॉ. उषा किरण श्रीवास्तव, डॉ. संगीता सागर, डॉ. रेणु शर्मा (वैशाली) तथा डॉ. त्रिलोक चंद फतेहपुरी को उनकी साहित्यिक कृतियों और साहित्य सेवा के लिए सम्मानित किया गया। इस अवसर पर गोरखपुर की वरिष्ठ साहित्यकार कमलेश मिश्रा, संतोष देवी सहित अनेक साहित्यकार, विद्वान और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में साहित्य और समाज में महिलाओं की भूमिका पर भी विशेष चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि भारतीय साहित्य परंपरा में नारी केवल सृजन की प्रेरणा नहीं, बल्कि संस्कृति और संस्कारों की प्रमुख संवाहक रही है। लोकार्पित पुस्तकों में नारी मन, मातृत्व, भक्ति और संवेदना की प्रमुख उपस्थिति इस तथ्य को रेखांकित करती है।
“हर घर से एक पुस्तक, हर घाट से स्वच्छ गंगा” का संकल्प
समारोह के अंत में उपस्थित साहित्यकारों, विद्वानों और समाजसेवियों ने सामूहिक रूप से “हर घर से एक पुस्तक, हर घाट से स्वच्छ गंगा” का संकल्प लिया। इस संकल्प के माध्यम से साहित्य को घर-घर पहुँचाने और गंगा के घाटों को स्वच्छ रखने के लिए जनभागीदारी बढ़ाने का संदेश दिया गया।
सम्मान प्राप्त करने के बाद भावुक होते हुए सत्येंद्र कुमार पाठक ने कहा, “यह सम्मान मेरा नहीं, बिहार की मिट्टी का और माँ गंगा का है। मैं इसे गंगा संरक्षण के संकल्प के रूप में स्वीकार करता हूँ।” उन्होंने कहा कि साहित्यकार और इतिहासकार का दायित्व केवल इतिहास लिखना नहीं, बल्कि समाज को अपनी जड़ों, संस्कृति और प्रकृति के प्रति जागरूक करना भी है।समारोह के समापन पर पूरा अवधूत आश्रम परिसर “हर हर गंगे” और “जय माँ गंगा, जय साहित्य” के जयघोष से गूंज उठा। दो दिनों तक चले इस साहित्यिक कुंभ ने यह संदेश दिया कि जब साहित्य की चेतना, अध्यात्म की शक्ति और पर्यावरण संरक्षण का संकल्प एक मंच पर आते हैं, तब समाज में परिवर्तन की नई ऊर्जा जन्म लेती है। हरिद्वार की पवित्र धरती पर संपन्न यह आयोजन साहित्य और गंगा संस्कृति के संरक्षण की दिशा में एक सार्थक पहल के रूप में स्मरण किया जाएगा।
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

0 टिप्पणियाँ
दिव्य रश्मि की खबरों को प्राप्त करने के लिए हमारे खबरों को लाइक ओर पोर्टल को सब्सक्राइब करना ना भूले| दिव्य रश्मि समाचार यूट्यूब पर हमारे चैनल Divya Rashmi News को लाईक करें |
खबरों के लिए एवं जुड़ने के लिए सम्पर्क करें contact@divyarashmi.com
#NEWS,
#hindinews