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बीस जुलाई : तरुणाई की अरुणाई

बीस जुलाई : तरुणाई की अरुणाई

कुमार महेंद्र
जंतर-मंतर की पावन धरती से,
संसद के गलियारों तक।
गूँजे सत्य का दिव्य स्वर,
न्याय के हर द्वारों तक।
हाथों में शांति-मशाल लिए,
सत्य-पथ पर बढ़ते जाना।
सभ्य, शालीन और अनुशासित,
नव-इतिहास सदा रच जाना।
शांति-मार्च की इस बेला में,
जन-जन में चेतना छाई।
बीस जुलाई, तरुणाई की अरुणाई।।


नहीं क्रोध का कोई ज्वार यहाँ,
नहीं उग्रता का आवेग।
दृढ़ संकल्पों से आलोकित,
युवाशक्ति का दिव्य अभिषेक।
अधिकारों की रक्षा हेतु,
उमड़ा जन-विश्वास महान।
शांति-मार्च का प्रत्येक चरण,
लोकतंत्र का बने जयगान।
जाग उठा जन-मन का गौरव,
नव-आशा फिर मुस्काई।
बीस जुलाई, तरुणाई की अरुणाई।।


पेपर लीक का कलंक मिटे,
हर विद्यार्थी को न्याय मिले।
'एक देश, एक शिक्षा' का,
सपना साकार सदा खिले।
रोजगार की सच्ची गरिमा,
हर युवा-मन में जोश।
संसद तक यह शांति-मार्च,
परिवर्तन का सशक्त उद्घोष।
टूटें अन्यायों की बेड़ियाँ,
युवा चेतना लहराई।
बीस जुलाई, तरुणाई की अरुणाई।।


बढ़ते कदम, शांत दृष्टि में,
धैर्य-दीप की ज्योति जले।
संसद के पावन प्रांगण में,
जन-मन की आशाएँ फलें।
अन्यायों की हर दीवार को,
सत्य-साहस से झुकाना।
बीस जुलाई के इस अवसर को,
स्वर्णिम दिवस बनाना।
परिवर्तन का शंख बजाने,
नवयुग ने ली अंगड़ाई।
बीस जुलाई, तरुणाई की अरुणाई।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)


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