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दूर के ढोल सुहावाने

दूर के ढोल सुहावाने

संजय जैन

राज-ए-जिंदगी का मैं
आज एक बताता हूँ।
लगी थी जो चोट मुझे
उस दिलको दिखता हूँ।।


जख्म गहरे हो या हल्के
पर दर्द तो बहुत देते है।
जिंदगी को हमारी देखो
दुखों से जो भर देते है।।


वो तो पहले भी हमारे
न थे और न अब है।
पर हम ही उनको क्यों
अब तक दिलसे लगाए है।।


जहर पी-कर भी हम
क्यों इतने खुश हैं।
उदासी से भरे जीवन में
पता नही क्यों खुश हैं।।


लूटाकर सुख चैंन अपना
क्यों उनके लिए परेशान है।
जबकि वह तो पहले से ही
किसी और की बाहों में है।।


आज कल किसी के भी
चरित्र को पढ़ नही सकते।
अंदर बाहर के स्वाभव को
हम समझ ही नही सकते।।


दाग दमन पर उनके लगे है
जिसे मिटा दिखाना संभव नही।
न ही उन्हें तुम छुपा सकते हो
बस मरहम लगवा सकते हो।।


आकर चौहराएँ पर अटग गया हूँ
जिंदगी का रास्ता भटक गया हूँ।
इसलिए तो जान पहचान वाले
देखो अब दूर होते जा रहे है।।


पर आपदा में अवसर वालें
आज कल बहुत मिल रहे है।
छोटी-छोटी बातों पर अपनी
सहमति ज्यादा ही दे रहे है।।


कल तक जो जान देते थे
अब जान लेने पर तुले है।
दूर से तो सब अच्छे लगते है
पर पास आते ही वो काटते है।।


जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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