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स्वर्ग, नर्क और हम...

स्वर्ग, नर्क और हम...

लेखक आनंद हठिला
मृत्यु के बाद स्वर्ग में जगह मिले, इसके लिए इंसान जिंदगी भर कितनी जद्दोजहद करता है, मानो स्वर्ग कोई नई हाउसिंग सोसाइटी हो और वहां 1 BHK बुक करने के लिए पॉइंट्स जमा करने हों।
लेकिन, मुझे एक सवाल सूझता है अगर हम पहले से ही स्वर्ग में रह रहे हों तो...?
जरा सुबह उठकर अपने आस पास गौर से देखिए...

एक बटन दबाया कि लाइट जल गई, दूसरा बटन दबाया कि पंखा चलने लगा, तीसरा दबाया तो एसी चालू हो गया।

नल खोला कि पानी आ गया। गैस जलाई कि कुछ ही मिनटों में खाना तैयार। मोबाइल निकाला कि दुनिया भर की जानकारी हाथ में।

कोई दोस्त-रिश्तेदार अगर अमेरिका में भी हो, तो सेकेंडों में उसका चेहरा सामने आ जाता है और यह सब हम इतने सहज भाव से लेते हैं, मानो यह पृथ्वी की नहीं बल्कि हमारी जन्मसिद्ध सुविधाएं हों।

आज से सिर्फ दो सौ साल पहले के किसी राजा को अगर हमारे घर ले आया जाए, तो शायद वह घर से बाहर निकलने को ही तैयार नहीं होगा।
"*यह क्या है?" — "गरम पानी।"*
"*यह?" — "ठंडी हवा।"*
"*यह?" — "दुनिया भर की* *जानकारी।"*
"*यह?" — "दस मिनट में पिज्जा घर पर।"*
राजा कहेगा, "मैंने जिंदगी भर राज किया, युद्ध जीते, खजाने बटोरे, लेकिन यह सुख तो मुझे कभी मिला ही नहीं!"
यानी हकीकत तो यह है कि आज का एक आम इंसान कई मायनों में कल के राजा से ज्यादा ऐशो-आराम की जिंदगी जी रहा है।

लेकिन तमाशा देखिए...हम इन सब चीजों की तरफ ध्यान ही नहीं देते। क्योंकि इंसान के पास जो होता है, वह उसकी कदर नहीं करता।

एसी चल रहा है, इसलिए खुशी नहीं है; एसी बंद हो जाए, तो दुख है।

मोबाइल है, इसलिए खुशी नहीं है; नेटवर्क चला जाए, तो लगता है दुनिया ही खत्म हो गई।

घर है, इसलिए खुशी नहीं है; पड़ोसी का घर बड़ा है, इसलिए दुख है।

गाड़ी है, इसलिए खुशी नहीं है; उसके पास बड़ी गाड़ी है, इसलिए दुख है।

इंसान अपने खुद के स्वर्ग में खड़ा होकर दूसरों के स्वर्ग से तुलना कर रहा होता है।

सिक्के का दूसरा पहल...

लेकिन इसी वक्त पृथ्वी पर एक दूसरी तस्वीर भी है, आज भी लाखों लोग पीने के पानी के लिए कतारों में खड़े रहते हैं। कुछ लोगों के पास रहने को पक्का मकान नहीं है। कुछ लोगों को दो वक्त की रोटी का भरोसा नहीं है। कुछ बच्चों को शिक्षा नहीं मिल पाती। कुछ लोगों के पास पहनने को ढंग के कपड़े तक नहीं हैं।

हम जिन चीजों को "नॉर्मल" या आम मानते हैं, वे कई लोगों की जिंदगी का सबसे बड़ा सपना होती हैं।

हमें नल से आता हुआ पानी दिखता है; उन्हें पानी के लिए मीलों पैदल चलना पड़ता है।

हमें एसी का रिमोट नहीं मिल रहा, इसलिए गुस्सा आता है; उन्हें धूप से बचने के लिए पेड़ की छांव ढूंढनी पड़ती है।

हम डाइट प्लान ढूंढते हैं; वे सोचते हैं कि अगली बार का खाना कहां से आएगा।

इसीलिए मुझे लगता है कि स्वर्ग और नर्क मृत्यु के बाद के पते नहीं हैं। वे यहीं हैं। इसी शहर में, इसी गांव में, कभी-कभी तो एक ही सड़क पर।

एक घर में बच्चा नया मोबाइल स्लो होने की वजह से नाराज है; सामने वाले घर में बच्चा ऑनलाइन क्लास के लिए मोबाइल न होने के कारण पढ़ नहीं पा रहा है।

एक आदमी को गर्म पानी देर से मिला, इसलिए चिढ़ हो रही है; दूसरे को सिर्फ पानी ही मिल जाए, तो वह खुशी-खुशी नहा लेता है।

फर्क सिर्फ परिस्थितियों का नहीं है, फर्क दृष्टिकोण (नजरिए) का भी है।

क्योंकि कुछ लोग नर्क जैसी स्थिति में रहकर भी हंसते हैं, और कुछ लोग स्वर्ग में रहकर भी चौबीसों घंटे कुढ़ते रहते हैं।

क्या है समाधान..?

इंसान की एक आदत बड़ी अजीब है*- *वह जो उसके पास नहीं है, उसकी लिस्ट रोज बनाता है। लेकिन जो उसके पास है, उसकी लिस्ट कभी नहीं बनाता।

अगर हर कोई रात को सोने से पहले सिर्फ पांच बातें लिख ले:

आज मैं खुलकर सांस ले पा रहा हूं।
आज मेरे पास पीने का साफ पानी है।
आज मेरे पास खाने को अन्न है।
आज मेरे पास सोने के लिए छत/जगह है।
आज मेरे अपनों का साथ मेरे पास है।

तो शायद जिंदगी को देखने का पूरा नजरिया ही बदल जाएगा।

हम स्वर्ग ढूंढ रहे हैं, लेकिन शायद स्वर्ग कोई जगह नहीं बल्कि एक 'एहसास' है और नर्क भी कोई जगह नहीं बल्कि एक 'भूल' है।

जो हमारे पास है, उसकी कीमत भूल जाना ही 'नर्क' है।

जो हमारे पास है, उसके प्रति कृतज्ञ (Thankful) होना ही 'स्वर्ग' है।

बाकी, मरने के बाद क्या मिलेगा यह तो कोई नहीं जानता।

लेकिन जिंदा रहते हुए पृथ्वी जैसा ग्रह, सांस लेने के लिए हवा, पीने को पानी, खाने को अन्न, प्यार करने वाले लोग और बटन दबाते ही मिलने वाली हजारों सुविधाएं होने के बावजूद लगातार दुखी रहना... यह भी अपने आप में एक मजाक ही है।

शायद भगवान भी ऊपर बैठकर हंस रहे होंगे..."*अरे, मैंने तो तुम्हें स्वर्ग में भेजा था। लेकिन तुमने अपनी जिंदगी को नरक क्यों बना लिया?

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