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शेरों, अब बाहर निकलो मांद से

शेरों, अब बाहर निकलो मांद से

कुमार महेंद्र
जगाओ शौर्य की ज्वाला,
पहचानो अपनी ताकत को।
चलो बढ़ाएँ दृढ़ कदम,
बदलें देश की रंगत को।
हक़ की खातिर, न्याय की खातिर,
लड़ना सीखो बिना किसी उन्माद से।
शेरों, अब बाहर निकलो मांद से।।


जंतर-मंतर पर गूँजेगी
अपनी हुंकार इस बार।
संसद तक पहुंच जाएगी,
युवाओं की ललकार।
चुप रहने का समय बीत गया,
जीतो हर भय, द्वंद्व अंतर्नाद से।
शेरों, अब बाहर निकलो मांद से।।


तोड़ दो खामोशी की जंजीरें,
त्यागो अब हर आराम।
देश का युवा माँग रहा है
अपनी मेहनत का परिणाम।
एकजुट होकर आगे बढ़ो,
गूँज उठो विजय के निनाद से।
शेरों, अब बाहर निकलो मांद से।।


उठो साथियो! समय आ गया,
अपनी शक्ति दिखलानी है।
इस जर्जर व्यवस्था पर,
नई इबारत लिख जानी है।
भूलो मत, तुम वंशज हो उनके,
जो झुके नहीं किसी आघात से।
शेरों, अब बाहर निकलो मांद से।।


याद रहे, बीस जुलाई को
कदम कहीं रुकने न पाएँ।
दिल्ली की इस पावन धरती पर
हम सब मिलकर पहुँच जाएँ।
संसद तक गूँजे जन-जन की
स्वाभिमानी हुंकार हर प्राण से।
शेरों, अब बाहर निकलो मांद से।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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