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युगपरिवर्तक चेतना का अवतरण: भगवान महावीर

युगपरिवर्तक चेतना का अवतरण: भगवान महावीर

सत्येन्द्र कुमार पाठक
जैन दर्शन में आत्मा के क्रमिक विकास और परम पद (मोक्ष) की प्राप्ति को जीवन का अंतिम लक्ष्य माना गया है। जब कोई महान आत्मा अपने पूर्व जन्मों के कठिन तप, साधना और लोक-कल्याण की भावना से 'तीर्थंकर नाम-कर्म' का उपार्जन करती है, तो उसका धरा पर अवतरण संपूर्ण सृष्टि के लिए मंगलकारी बन जाता है। जैन परंपरा में किसी भी तीर्थंकर के जीवन से जुड़े पाँच महा-उत्सवों को 'पंचकल्याणक' कहा जाता है। इसमें सबसे पहला और आधारभूत कल्याणक 'गर्भ कल्याणक' (या च्यवन कल्याणक) है। २४वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का गर्भ काल जैन इतिहास का एक अत्यंत अलौकिक, संवेदनशील और अनूठा अध्याय है, जो मानव जाति को करुणा और कर्तव्य का शाश्वत संदेश देता है।
जैन पंचांग के अनुसार, ईसा पूर्व छठी शताब्दी (लगभग ५९९ ईसा पूर्व) में आषाढ़ शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को भगवान महावीर का जीव अच्युत कल्प (स्वर्ग) से च्युत होकर मृत्युलोक में अवतरित हुआ। तीर्थंकर के गर्भ में आते ही संपूर्ण ब्रह्मांड में एक सकारात्मक ऊर्जा और अपूर्व शांति का संचार हो गया। इस पावन अवसर पर माता को रात्रि के अंतिम प्रहर में अत्यंत शुभ और अलौकिक स्वप्न दिखाई दिए। श्वेतांबर परंपरा के अनुसार माता ने १४ महास्वप्न देखे, जबकि दिगंबर परंपरा में १६ महास्वप्नों की मान्यता है। इन स्वप्नों में ऐरावत हाथी, सिंह, लक्ष्मी देवी, पूर्ण कलश, सूर्य, चंद्रमा और निर्धूम अग्नि जैसी दिव्य आकृतियाँ शामिल थीं। राजज्योतिषियों ने इन स्वप्नों का विश्लेषण करते हुए राजा सिद्धार्थ को बताया कि उनका होने वाला पुत्र कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जगत का चक्रवर्ती सम्राट (तीर्थंकर) बनेगा, जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर संसार को सत्य और अहिंसा का मार्ग दिखाएगा। भगवान महावीर के गर्भ काल की सबसे विशिष्ट और ऐतिहासिक रूप से चर्चित घटना 'गर्भापहार' या 'गर्भ संहरण' (गर्भ का बदलना) है। श्वेतांबर जैन आगमों (जैसे कल्पसूत्र) के अनुसार, महावीर स्वामी का जीव सर्वप्रथम वैशाली/क्षत्रियकुंड क्षेत्र के एक ब्राह्मण ऋषभदत्त की पत्नी देवानंदा के गर्भ में आया था, जहाँ वे ८२ दिनों तक रहे।
चूंकि जैन परंपरा के शाश्वत नियमों के अनुसार तीर्थंकर का जन्म सदैव उत्तम और पराक्रमी राज्यवंश (क्षत्रिय कुल) में ही होता है, इसलिए सौधर्म इंद्र ने अवधिज्ञान से इस विसंगति को देखा। इंद्र के आदेश पर उनके सेनापति देव हरिणैगमेषी ने आश्विन (आसोज) कृष्ण त्रयोदशी की मध्य रात्रि में देवानंदा के गर्भ को अत्यंत कुशलता और बिना किसी पीड़ा के राजा सिद्धार्थ की पत्नी माता त्रिशला के उदर में स्थानांतरित कर दिया।
दिगंबर जैन परंपरा इस गर्भ-परिवर्तन की घटना को स्वीकार नहीं करती है। दिगंबर मान्यता के अनुसार, तीर्थंकर का जीव कभी अकुलीन या किसी अन्य गर्भ में नहीं जा सकता; इसलिए भगवान महावीर का गर्भधारण सीधे माता त्रिशला की पवित्र कुक्षी में ही संपन्न हुआ था। गर्भ में रहते हुए बालक महावीर मति, श्रुत और अवधि ज्ञान से संपन्न थे। इस काल की एक अत्यंत मार्मिक घटना उनके 'करुणा सागर' होने का प्रमाण देती है। गर्भवास के दौरान महावीर स्वामी ने विचार किया कि उनके हिलने-डुलने से माता त्रिशला को शारीरिक कष्ट होता है। अपनी माता के प्रति अगाध करुणा के कारण उन्होंने गर्भ में अपनी हलचल को पूरी तरह रोक दिया।जब कई दिनों तक गर्भ में कोई स्पंदन नहीं हुआ, तो माता त्रिशला अत्यंत चिंतित और शोकग्रस्त हो गईं कि कहीं गर्भ को कोई नुकसान तो नहीं पहुँच गया। माता के इस तीव्र दुख को जानकर गर्भस्थ महावीर ने पुनः धीरे से हलचल की ताकि माता को तसल्ली हो सके। उसी क्षण उन्होंने गर्भ के भीतर ही एक महान संकल्प (अभिग्रह) लिया कि—"जब तक मेरे माता-पिता जीवित हैं, मैं गृहत्याग कर दीक्षा (सन्यास) ग्रहण नहीं करूँगा, ताकि उन्हें मेरे बिछड़ने का वियोग न झेलना पड़े।" यह घटना सिद्ध करती है कि महावीर जन्म से पूर्व ही अहिंसा और करुणा के साक्षात प्रतिरूप थे। गर्भ में आते ही जिनके प्रभाव से संपूर्ण राज्य में सुख, समृद्धि, धन और वैभव की निरंतर वृद्धि हुई, इसीलिए उनका नाम 'वर्धमान' रखा गया। भगवान महावीर का गर्भ कल्याणक केवल एक शिशु के जन्म की शारीरिक प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि यह ब्रह्मांड में सत्य, अहिंसा और अनेकांतवाद के सूर्य के उदय की पूर्वपीठिका थी। उनका यह पावन दिवस हमें सिखाता है कि माता-पिता के प्रति आदर और समस्त जीवों के प्रति दया की भावना मनुष्य के अंतःकरण में जन्म से पूर्व ही अंकुरित होनी चाहिए ।
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