साहित्यकार सत्येन्द्र कुमार पाठक 'सृजन श्रेष्ठ' सम्मान से विभूषित;

सिरसा (हरियाणा) । मातेश्वरी विद्यादेवी बाल साहित्य शोध संस्थान के सौजन्य से 'अखिल भारतीय बाल साहित्य सम्मेलन' के व्हाट्सएप मंच, सिरसा (हरियाणा) द्वारा एक गरिमामयी साहित्यिक समारोह का आयोजन किया गया। इस विशेष कार्यक्रम में करपी, अरवल (बिहार) के मूल निवासी, प्रख्यात साहित्यकार एवं इतिहासकार सत्येन्द्र कुमार पाठक को उनकी बहुमुखी साहित्यिक सेवाओं और उत्कृष्ट लेखन के लिए 'बाल लोरी, कविता, कहानी, आलेख, नाटक, समीक्षा सृजन श्रेष्ठ' सम्मान से नवाजा गया।।इस गरिमामयी सम्मान की घोषणा और चयन प्रक्रिया में डॉ. राज कुमार निजात तथा रश्मि श्री की महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिन्होंने सत्येन्द्र कुमार पाठक की विभिन्न विधाओं में रचित कृतियों की गहन समीक्षा की और उन्हें सर्वसम्मति से सर्वश्रेष्ठ घोषित किया। कार्यक्रम के दौरान अखिल भारतीय बाल साहित्य सम्मेलन के संस्थापक व संयोजक डॉ. राजकुमार निजात, संयोजक राकेश कुमार जैन 'बंधु' तथा सह-संयोजक बलवीर सिंह वर्मा 'बाग़िश' ने संयुक्त रूप से पाठक जी को इस प्रतिष्ठित सम्मान से विभूषित किया।
समारोह के दौरान विशिष्ट वक्ता विदुषी सौम्या पाण्डेय ने सत्येन्द्र कुमार पाठक द्वारा प्रस्तुत ऋग्वेद की एक विलक्षण ऐतिहासिक कथा की भूरि-भूरि प्रशंसा की। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा:।"जब भी हम किसी नई तकनीक या आधुनिक विकास की बात करते हैं, तो अक्सर विदेशी आविष्कारों की ही चर्चा की जाती है। इसके विपरीत, हमारी भारतभूमि सदैव से ही आविष्कारों की जननी रही है, जिसका वैदिक प्रमाण इसकी सत्यता को अकाट्य रूप से स्थापित करता है।" उन्होंने आगे कहा कि पाठक जी द्वारा प्रस्तुत ऋग्वैदिक रानी विश्पला की जीवनी नारी के साहस, विद्या और वीरता की एक अद्भुत मिसाल है। युद्ध में पैर गंवाने के बाद लोहे का कृत्रिम पैर (प्रोस्थेटिक लेग) लगाए जाने की यह कथा वैश्विक इतिहास में शल्य चिकित्सा (सर्जरी) का प्रथम व उत्कृष्ट उदाहरण है। ऐसी वीरांगनाओं की गाथाएं सुनकर देश की नारियों का आत्मगौरव और ओज स्वयं जाग्रत होगा। उन्होंने आलेख में शामिल प्रेरक श्लोकों के उद्धरणों की भी सराहना की।
संस्थान के संस्थापक डॉ. राजकुमार निजात ने पाठक जी के शोधपूर्ण आलेख पर अपने विचार रखते हुए कहा कि बाल साहित्य के उद्भव, विकास और वर्तमान परिदृश्य को समेटे हुए यह आलेख अत्यंत संक्षिप्त, अर्थपूर्ण और बहुआयामी है। इसमें बाल साहित्य के 150 वर्षों के मुख्य ऐतिहासिक पड़ावों पर प्रामाणिक प्रकाश डाला गया है। डॉ. निजात ने रेखांकित किया कि पिछले डेढ़ सौ वर्षों के इतिहास में जिन पत्र-पत्रिकाओं ने बाल साहित्य को भरपूर ऊर्जा के साथ पोषित किया है, उसकी विस्तृत जानकारी इस आलेख में समाहित है। यह शोधपरक सामग्री बच्चों को उत्साहित करेगी और उन्हें अपने समृद्ध साहित्य के महत्व से परिचित कराएगी। उन्होंने कहा कि यद्यपि ऐसे शोधपूर्ण कार्यों की कोई निश्चित सीमा नहीं होती, फिर भी आलेख अपनी दृष्टि से पूर्णतः परिपूर्ण और हर वर्ग के लिए समान रूप से उपयोगी है।
सम्मान समारोह में सत्येन्द्र कुमार पाठक द्वारा रचित बाल नाटिका/एकांकी की समीक्षा भी की गई, जो दर्शकों और पाठकों के लिए अत्यंत अनुकरणीय पाई गई। वक्ताओं ने कहा कि यह नाटक वर्तमान पीढ़ी को एक बड़ा संदेश देता है कि:जीवन का असली गहना भौतिक वस्तुएं नहीं, बल्कि आपसी प्रेम और अटूट विश्वास है।हमें आधुनिक तकनीकों और साधनों का उपयोग अवश्य करना चाहिए, लेकिन इनके चक्कर में अपने स्थायी सामाजिक रिश्तों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। समाज में चाहे कोई साधन-संपन्न हो या निर्धन, सभी का समान रूप से आदर होना चाहिए।यह जीवन केवल भौतिक सुख-सुविधाओं के उपभोग से महान नहीं बनता, बल्कि एक-दूसरे के प्रति इंसानियत की भावना रखने से महान बनता है। यह एकांकी बच्चों के मनोरंजन के साथ-साथ उनके नैतिक व शैक्षणिक विकास के सर्वथा अनुकूल है। इस अति सुंदर, विशिष्ट और संदेशप्रद नाट्य सृजन के लिए सभी वरिष्ठ साहित्यकारों ने सत्येन्द्र कुमार पाठक को हार्दिक बधाई एवं उज्ज्वल साहित्यिक भविष्य की शुभकामनाएं दीं।
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