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कैसे बाजार चलता

कैसे बाजार चलता


न बिकता है न टिकता है
पर बाजार में नाम चलता है।
सारा का सारा खेल बाजार का
इसी तरह से रोज चलता है।।


न लेने वाला कोई दिखता है
न बेचने वाला नजर आता है।
पर बाजार में पैसे का खेल
रोज ही जोरों से होता है।।


कागजो का काम बढ़ गया है
जिन पर रोज लिखा जाता है।
क्या लिखा जाता किसके लिए
ये तो किसी को नही पता।।


बाजारों में रोनक आ कर
क्यों खामोस हो जाती।
खेल-खेल में तुम देखो
लाखों रुपये लूट जाते।।


यही एक सच्चा सच है
जो लोगों से छुपाया जाता है।
पर झूठी साँची प्रसन्नाता का
डोल रोज जो पिटा जाता।।


जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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