"दमन और दावानल"
पंकज शर्मासिंहासन के मद में डूबा,
फिर घिर आया अँधियारा है,
हक़ की आवाज़ उठी तो बस,
लाठी का पहरा सारा है।
निहत्थे सपनों पर बरसी,
सत्ता की निर्मम बौछार,
रक्त-बूँद से लिख डाला तुमने,
अपने शासन का विस्तार।
संविधान की आँखों पर क्यों,
सत्ता ने पट्टी बाँधी है?
न्यायालय के मौन प्रांगण में,
किसने साँसें साधी हैं?
लोकतंत्र के वटवृक्षों पर,
भय की बेलें चढ़ती हैं,
सच की हर उन्मुक्त जुबाँ पर,
लोहे की मुहरें जड़ती हैं।
धुएँ-धुएँ हैं दिशाएँ सारी,
घुटता जन-जन का उच्छ्वास,
कब तक कुचले जाओगे तुम,
कब तक रोकोगे विश्वास?
चीखों के नीचे दबा हुआ जो,
अंगार अभी जीवित है,
अन्यायों के हर सिंहासन का,
पतन स्वयं सुनिश्चित है।
युवा नहीं अब झुकने वाले,
आँखों में अंगार लिए,
हर प्रश्न उठेगा निर्भय होकर,
सत्य का अधिकार लिए।
इतिहास सदा दोहराता है—
दमन कभी अमर नहीं होता,
जब जनता संकल्पित होती,
सिंहासन स्थिर नहीं होता।
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️"कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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