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लोकतंत्र पर लाठी का प्रहार

लोकतंत्र पर लाठी का प्रहार

कुमार महेंद्र
थर-थरा उठी धरा,
अंबर में चीत्कार हुआ।
जब शांति मार्च के युवाओं पर,
निर्मम प्रहार हुआ।
हाथों में तिरंगा थामे निकले,
सत्य के दृढ़ पहरेदार।
लोकतंत्र पर लाठी का प्रहार।।


रणभेरी अब बज उठी है,
पीछे कदम न जाएंगे।
सत्य, न्याय और स्वाभिमान की,
ज्योति सदा जलाएंगे।
जन-अधिकारों की रक्षा हित,
गूँजे जन-हुंकार।
लोकतंत्र पर लाठी का प्रहार।।


इतिहास साक्षी है इसका,
जब युवा जाग उठता है।
अन्याय का हर ऊँचा पर्वत,
क्षण भर में झुक जाता है।
लाठियों से कब रुकी है,
जन-जन की ललकार?
लोकतंत्र पर लाठी का प्रहार।।


रक्तिम हुईं सड़कें चाहे,
पर साहस अडिग खड़ा है।
युवा चेतना के सम्मुख,
अन्याय स्वयं डरा है।
सत्य और साहस के आगे,
टिकता कब अत्याचार?
लोकतंत्र पर लाठी का प्रहार।।


लोकतंत्र की पावन धरती,
संवादों से महकेगी।
युवा शक्ति की सत्य-साधना,
नव-इतिहास बन चहकेगी।
न्याय, शांति और जन-अधिकारों का,
होगा फिर सम्मान अपार।
लोकतंत्र पर लाठी का प्रहार।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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