सुखाड़
जय प्रकाश कुवंरधरती झांझांइल बा,
फूल पत्ति मुरझाइल बा।
अब बरसात मझधार बा,
मूसलाधार बरखा दरकार बा।।
सावन में फुहार से का होइ,
ना धरती ठंढइहें,
ना धान के रोपनी होइ।।
देवता काहे रुसल बानी,
अबहियों बरसाईं गाँव में,
धुंआधार पानी।।
किसान लोग जब खेती करिहें,
सबकर पेट अन्न से भरिहें।।
खेती बारी में खुशहाली आई,
इन्द्र देव रउरा से इहे बा दुहाई।।
जय प्रकाश कुवंर
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