जिसे यह तन हराता है
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चलेगी जब तलक काया
तभी तक हैं सभी पुरजन,
शिथिल होते ही हे भाई
बदल जाते हैं सब चिंतन।
कोई कहता उठा लेना
प्रभु कोई पीर मत देना,
हैं सुख के ही सभी साथी
किसी से कुछ भी क्या कहना?
बसा हूँ जिस घरौंदे में
नहीं अपना पराया है,
जुटाया धन परिश्रम से
कमाया या गँवाया है?
चरैवेति का संदेशा
ठहर जाता डराता है,
है शुभ संकल्प वाला मन
जिसे यह तन हराता है।
हे दीनानाथ अविनाशी
हमें उस पार ले जाना,
अगर मैं भूल जाऊँ तो
क्षमा करना औ अपनाना।
रजनीकांत।
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