हिंदी दिवस बना ‘आत्ममंथन दिवस’, हिंदी को उसका अधिकार दिलाने की उठी बुलंद आवाज

- डॉ. विवेकानंद मिश्र बोले-हिंदी की उपेक्षा घोर राष्ट्रीय अपराध, यह केवल भाषा नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति और चेतना की वाहक
पटना। हिंदी दिवस के अवसर पर स्थानीय डॉक्टर विवेकानंद पथ पर हिंदी की वर्तमान स्थिति, उसकी चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं को लेकर एक विचारपूर्ण एवं सार्थक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में उपस्थित विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं बौद्धिक संगठनों से जुड़े लोगों ने हिंदी दिवस को महज उत्सव अथवा औपचारिकता के रूप में मनाने के बजाय इसे ‘आत्ममंथन दिवस’ के रूप में मनाने पर जोर दिया। वक्ताओं ने कहा कि हिंदी को उसका वास्तविक सम्मान और अधिकार तभी मिल सकता है, जब समाज स्वयं अपनी भाषा के प्रति गंभीरता और जिम्मेदारी का परिचय दे।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कौटिल्य मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विवेकानंद मिश्र ने कहा कि हिंदी वह गौरवमयी भाषा है, जिसने राष्ट्रभक्तों और आम जनमानस को एकता के सूत्र में पिरोने का कार्य किया तथा स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में क्रांतिकारियों को प्रचंड ऊर्जा और स्वर प्रदान किया। ऐसी गौरवशाली भाषा की निरंतर उपेक्षा उनके अनुसार घोर राष्ट्रीय अपराध है।
उन्होंने कहा कि हिंदी को केवल एक भाषा के रूप में देखने की भूल नहीं की जानी चाहिए। हिंदी भारतीय संस्कृति, सभ्यता, संवेदना और राष्ट्रीय चेतना की सशक्त वाहक है। यह भारत के करोड़ों लोगों के बीच संवाद और भावनात्मक एकता का माध्यम रही है। उन्होंने कहा कि हिंदी केवल अतीत के गौरव की भाषा नहीं, बल्कि वर्तमान की आवश्यकता और भविष्य की दिशा भी है।
डॉ. मिश्र ने कहा कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल उसकी आर्थिक या सैन्य क्षमता से निर्धारित नहीं होती, बल्कि उसकी सांस्कृतिक जड़ों और भाषायी आत्मविश्वास से भी होती है। जिस राष्ट्र को अपनी भाषा पर विश्वास नहीं होता, वह धीरे-धीरे अपनी मौलिक सोच और सांस्कृतिक पहचान से भी दूर होता जाता है। इसलिए हिंदी को सम्मान देना केवल भाषा का सम्मान करना नहीं, बल्कि अपनी भारतीय अस्मिता और सांस्कृतिक चेतना को सम्मान देना है।
हिंदी की सरलता, व्यापकता और वैज्ञानिकता को मिले वैश्विक स्वीकार्यता : आचार्य सच्चिदानंद मिश्र
कार्यक्रम में आचार्य सच्चिदानंद मिश्र ने हिंदी की ऐतिहासिक यात्रा और वर्तमान चुनौतियों पर गंभीर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि हजार वर्षों की गुलामी तथा स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के सात दशकों से अधिक समय में हिंदी ने अनेक प्रकार की चुनौतियों का सामना साहस, धैर्य, मानवीय संवेदना और नैतिक मूल्यों के साथ किया है। हिंदी ने देश के विभिन्न क्षेत्रों, वर्गों और समुदायों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद देश के नीति-निर्माताओं और रहनुमाओं को हिंदी को पर्याप्त अवसर प्रदान करते हुए उसकी सरलता, सुलभता, व्यापकता और उसमें निहित श्रेष्ठ दर्शन को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित करने के लिए ठोस प्रयास करने चाहिए थे। लेकिन यह चिंता का विषय है कि आज भी शिक्षा और प्रशासन के अनेक क्षेत्रों में अंग्रेजी का प्रभाव अत्यधिक बना हुआ है।
आचार्य मिश्र ने कहा कि प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा और विश्वविद्यालयों तक भाषा को लेकर ऐसी व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता है, जिसमें विद्यार्थी अपनी मातृभाषा और हिंदी के माध्यम से ज्ञान-विज्ञान को सहजता से समझ सकें। केवल अंग्रेजी माध्यम को आधुनिकता और प्रतिभा का पर्याय मान लेना भारतीय भाषाओं के साथ अन्याय है।
उन्होंने कहा कि भाषा केवल परीक्षा पास करने का माध्यम नहीं होती। भाषा व्यक्ति के चिंतन, संकल्पना, अभिव्यक्ति और व्यावहारिक वैचारिक प्रतिभा को आकार देती है। यदि विद्यार्थी अपनी ही भाषा में जटिल विषयों को समझने और विचार करने में सक्षम होंगे, तो उनकी मौलिक चिंतन क्षमता अधिक प्रभावी ढंग से विकसित होगी।
हिंदी दिवस औपचारिकता नहीं, आत्ममंथन का दिन बने : वरिष्ठ अधिवक्ता याहिया
वरिष्ठ अधिवक्ता याहिया ने कहा कि हिंदी दिवस को केवल एक दिन हिंदी के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने और अगले दिन अपनी पुरानी कार्यशैली में लौट जाने तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि हिंदी दिवस के अवसर पर हमें अपने आचरण और व्यवहार का भी मूल्यांकन करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि हम वास्तव में हिंदी का सम्मान करना चाहते हैं तो हमें अपने दैनिक जीवन, सामाजिक व्यवहार, शिक्षा, न्याय, प्रशासन और सार्वजनिक संवाद में हिंदी तथा भारतीय भाषाओं के प्रयोग को बढ़ावा देना होगा। केवल मंचों से हिंदी की महिमा का गुणगान करने से स्थिति नहीं बदलेगी।
हिंदी को उसका अधिकार और न्याय दिलाने का संकल्प जरूरी : पूनम कुमारी
अधिवक्ता पूनम कुमारी ने कहा कि हिंदी के प्रति ईमानदार होना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि हिंदी दिवस को उत्सव की औपचारिकता तक सीमित करने के बजाय प्रत्येक व्यक्ति को ईमानदारीपूर्वक आत्ममंथन करना चाहिए कि हिंदी, जिस सम्मान और अधिकार की अधिकारी है, उसे वह स्थान क्यों नहीं मिल पा रहा है।
उन्होंने कहा कि हिंदी को उसका उचित स्थान दिलाने के लिए समाज के प्रत्येक वर्ग को अपनी भूमिका निभानी होगी। परिवार से लेकर विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, न्यायालय, प्रशासन और सामाजिक संस्थाओं तक हिंदी के सम्मानजनक एवं प्रभावी प्रयोग को बढ़ावा देना होगा।
हिंदी के प्रति व्यवहार बदले, तभी बदलेगी तस्वीर
कार्यक्रम में वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि हिंदी के विकास के लिए केवल सरकारी घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं। समाज को भी अपने व्यवहार में परिवर्तन लाना होगा। हिंदी में ज्ञान-विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा, कानून, अर्थव्यवस्था और आधुनिक विषयों की उत्कृष्ट सामग्री तैयार करनी होगी, ताकि हिंदी भाषी समाज को अपनी आवश्यकताओं के लिए अनिवार्य रूप से दूसरी भाषा पर निर्भर न रहना पड़े।
वक्ताओं ने यह भी कहा कि हिंदी को दूसरी भारतीय भाषाओं के विरोध में खड़ा करने के बजाय सभी भारतीय भाषाओं के साथ समन्वय स्थापित करते हुए आगे बढ़ाया जाना चाहिए। भारत की भाषायी विविधता उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक शक्ति है। हिंदी इस विविधता के बीच संपर्क और संवाद की महत्वपूर्ण कड़ी बन सकती है।
कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने हिंदी के प्रति अपने दायित्व को समझने तथा हिंदी के सम्मान, संवर्धन और व्यापक प्रयोग के लिए निरंतर प्रयास करने का संकल्प लिया। उपस्थित जनों का मानना था कि हिंदी की वास्तविक प्रतिष्ठा किसी सरकारी आदेश से नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के व्यवहार और आत्मविश्वास से सुनिश्चित होगी।
बड़ी संख्या में सामाजिक एवं बौद्धिक कार्यकर्ताओं की सहभागिता
हिंदी दिवस के इस आत्ममंथन कार्यक्रम में विभिन्न सामाजिक एवं बौद्धिक क्षेत्रों से जुड़े अनेक लोगों की उपस्थिति रही। इनमें ज्योति देवी, स्वामी सुमन गिरि, डॉ. रविंद्र कुमार, विजय बाबू, गायब, संदीप मिश्रा, सनोज देवी, महेश मिश्रा, सुगनी देवी, रवि कुमार, दिव्या प्रवेश, जितेंद्र मिश्रा, करइल मांझी, मनीष मिश्रा, शिवदास जी, गुड़िया देवी, अधिवक्ता पूनम कुमारी, दीपक पाठक, दिलीप कुमार, शंभू गिरि, नीरज वर्मा, प्रीति कुमारी, गौरव सिंह, रामकेवल सिंह, शिवजी, गजेंद्र सिंह, डिंपल कुमारी, मनीष कुमार, मृदुला मिश्रा, डॉ. ज्ञानेश भारद्वाज, शंभू कुमार, सागर साहब, नुसरत प्रवीण, रेशमा परवीन, तस्लीम नाज, डॉ. अकेला, शंभू लाल, मोहम्मद मासूक, जितेंद्र ठाकुर, गुप्तेश्वर ठाकुर, गुर्दा, चंद्रभूषण मिश्रा, अशोक कुमार, रंजीत पाठक, पवन मिश्रा, सुमन कुमारी, ममता कुमारी, शीतल चौबे, रंजन पांडे, पार्वती देवी, पुष्पा देवी, फूल कुमारी एवं प्यारी देवी सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का मूल संदेश यही रहा कि हिंदी दिवस केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपनी राष्ट्रीय चेतना के प्रति जिम्मेदारी का स्मरण कराने वाला अवसर है। यदि हिंदी को वास्तव में उसका सम्मान दिलाना है तो हमें भाषणों से आगे बढ़कर अपने व्यवहार में हिंदी को स्थान देना होगा। तभी हिंदी केवल ‘राजभाषा’ या ‘हिंदी दिवस’ की चर्चा तक सीमित न रहकर ज्ञान, रोजगार, प्रशासन, न्याय, तकनीक और वैश्विक संवाद की सशक्त भाषा बन सकेगी।
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