हिंदी के उत्संग में, हिंद का स्वस्तिवाचन
कुमार महेन्द्रशब्द सिखाएँ सहकार-भाव,
अक्षर दें अंतर्मन समरसता।
स्वर में श्रृंगार, मैत्री उन्मुख,
व्याकरण ज्योतित शुद्धता।
संज्ञा में मर्यादा-संस्कार,
सर्वनाम स्नेहिल मनभावन।
हिंदी के उत्संग में, हिंद का स्वस्तिवाचन।।
परिधान बने जैसे अलंकार,
उपसर्ग रचें मधुर मुस्कान।
कारक संग कर्म का आह्वान,
सदाचार ही बने चरित्र-पहचान।
प्रश्न-उत्तर दें कृतित्व-प्रभा,
प्रत्यय करें अंतःकरण पावन।
हिंदी के उत्संग में, हिंद का स्वस्तिवाचन।।
गद्य-पद्य का मधुर संप्रेषण,
रस से सरस हो अभिव्यक्ति।
अर्थ-भाव में शुभता स्पंदित,
विराम-चिह्न दें वाणी को शक्ति।
हो मृदु-मधुर मंगल उच्चारण,
विलोम-पर्याय उमंग-बिछावन।
हिंदी के उत्संग में, हिंद का स्वस्तिवाचन।।
लिंग-वचन का मोहक आकर्षण,
शुद्ध-सात्त्विक भाव-प्रवाह।
पत्र, कथा, कविता, कला,
निबंधों में आनंद अथाह।
शब्दकोश यह षोडश गुण-संपन्न,
अनुभूति में रिमझिम सावन।
हिंदी के उत्संग में, हिंद का स्वस्तिवाचन।।
इतिहास, उद्गम, वैदिक आभा,
तुलसी-कबीर व्यक्तित्व महान।
सर्वभाषा-सम्मान का सेतु,
हिंदी से राष्ट्रीयता का आह्वान।
कामना संस्कृत-सुता को मिले,
विश्व-पटल पर गौरव-आसन।
हिंदी के उत्संग में, हिंद का स्वस्तिवाचन।।
कुमार महेन्द्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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