ज्ञान के अंबार में प्रज्ञा का संकट
डॉ. राकेश दत्त मिश्र
- चाणक्य आज होते तो हमसे क्या पूछते?
“यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा, शास्त्रं तस्य करोति किम्।
लोचनाभ्यां विहीनश्च, दर्पणः किं करिष्यति।।’’
आचार्य चाणक्य का यह नीति-वचन आज किसी एक व्यक्ति, दल या विचारधारा के लिए नहीं, बल्कि हम सबके लिए एक दर्पण है।
हमारे पास संविधान है, कानून हैं, विश्वविद्यालय हैं, तकनीक है, मीडिया है और सूचना के अनगिनत स्रोत हैं। फिर भी समाज में भ्रम, अविश्वास, राजनीतिक कटुता और त्वरित निष्कर्षों की प्रवृत्ति क्यों बढ़ रही है?
क्या हमारे पास ज्ञान तो बहुत है, लेकिन प्रज्ञा कम होती जा रही है?
यही प्रश्न आज सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।
राजनीति से प्रश्न हो, लेकिन प्रश्न सब से हो
लोकतंत्र में सरकार से सवाल करना नागरिक का अधिकार है और विपक्ष से सवाल करना भी उतना ही आवश्यक है।
सत्ता में बैठा दल यदि जनहित में काम करता है तो उसकी उपलब्धियों को स्वीकार करना चाहिए, लेकिन जहां कमी हो वहां प्रश्न भी उठना चाहिए। उसी प्रकार विपक्ष यदि सरकार की आलोचना करता है तो उसकी आलोचना को भी केवल राजनीतिक विरोध मानकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए; उसके तर्क और तथ्यों की जांच होनी चाहिए।
लोकतंत्र का स्वास्थ्य इस बात से नहीं मापा जाता कि सत्ता में कौन है, बल्कि इस बात से मापा जाता है कि सत्ता से कितने निर्भीक प्रश्न पूछे जा सकते हैं।
आज भारतीय राजनीति में उपलब्धियों की चर्चा भी होती है और कमियों पर बहस भी। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब राजनीतिक समर्थन विवेक को पीछे छोड़ देता है।
क्या किसी सरकार की हर नीति सही हो सकती है?
क्या विपक्ष की हर आलोचना गलत हो सकती है?
क्या किसी नेता के हर निर्णय का समर्थन केवल इसलिए किया जाना चाहिए कि हम उसके समर्थक हैं?
नहीं।
चाणक्य की प्रज्ञा हमें दल से ऊपर उठकर नीति को देखने की सीख देती है।
सत्ता बदले, लेकिन नागरिक की दृष्टि न बदले
राजनीति में सत्ता परिवर्तन लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है। आज कोई दल सत्ता में है, कल कोई दूसरा दल हो सकता है।
लेकिन नागरिक का विवेक सत्ता परिवर्तन के साथ नहीं बदलना चाहिए।
जो प्रश्न हम आज सरकार से पूछते हैं, वही प्रश्न कल दूसरी सरकार से भी पूछने का साहस होना चाहिए।
यदि हम अपने पसंदीदा दल की गलती को “रणनीति” और विरोधी दल की उसी गलती को “भ्रष्टाचार” कहते हैं, तो समस्या राजनीति में ही नहीं, हमारी सोच में भी है।
निष्पक्षता का अर्थ यह नहीं कि सरकार और विपक्ष दोनों हमेशा बराबर गलत हैं।
निष्पक्षता का अर्थ है—
जो सही है, उसे सही कहना; जो गलत है, उसे गलत कहना—चाहे वह हमारे पक्ष का हो या विपक्ष का।
शिक्षा व्यवस्था : अंक बढ़े, विवेक कितना बढ़ा?
भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक विस्तार किया है। लेकिन अब हमें शिक्षा की गुणवत्ता से आगे बढ़कर उसके उद्देश्य पर भी विचार करना होगा।
क्या शिक्षा केवल नौकरी पाने का साधन है?
क्या अच्छे अंक ही प्रतिभा का अंतिम प्रमाण हैं?
क्या डिग्री प्राप्त कर लेना विवेकशील नागरिक बनने के लिए पर्याप्त है?
एक विद्यार्थी यदि कठिन प्रश्न हल कर सकता है, लेकिन समाज की समस्याओं पर स्वतंत्र चिंतन नहीं कर सकता, तो हमारी शिक्षा अधूरी है।
हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जो विद्यार्थी को केवल उत्तर याद न कराए, बल्कि सही प्रश्न पूछना सिखाए।
उसे अपने इतिहास पर गर्व करना भी आए और इतिहास का आलोचनात्मक अध्ययन करना भी।
उसे अपनी संस्कृति का सम्मान करना भी आए और दूसरे विचारों को सुनने का धैर्य भी।
यही शिक्षा प्रज्ञा को जन्म देती है।
सोशल मीडिया : लोकतंत्र का मंच या भावनाओं का बाजार?
सोशल मीडिया ने लोकतांत्रिक संवाद को अभूतपूर्व विस्तार दिया है। अब सामान्य नागरिक भी अपनी बात सीधे लाखों लोगों तक पहुँचा सकता है। राजनीतिक दल भी अपनी नीतियों और अभियानों को जनता तक पहुँचाने के लिए डिजिटल मंचों का बड़े पैमाने पर उपयोग कर रहे हैं। हालिया शोध भी दिखाता है कि सोशल मीडिया और विशेष रूप से शॉर्ट-वीडियो प्लेटफॉर्म भारत में राजनीतिक संवाद और जनमत निर्माण के तौर-तरीकों को बदल रहे हैं।
लेकिन इसके साथ एक खतरा भी है।
वायरल होना और सत्य होना—दो अलग बातें हैं।
एक वीडियो लाखों लोगों तक पहुँच सकता है और फिर भी उसका संदर्भ अधूरा हो सकता है।
एक पोस्ट लोकप्रिय हो सकती है और फिर भी तथ्यात्मक रूप से गलत हो सकती है।
एक तस्वीर वास्तविक हो सकती है, लेकिन उसका इस्तेमाल भ्रामक संदर्भ में किया जा सकता है।
इसलिए आज नागरिक की जिम्मेदारी पहले से अधिक बढ़ गई है।
शेयर करने से पहले सत्यापन—यही डिजिटल युग की प्रज्ञा है।
नेतृत्व की कसौटी : लोकप्रियता नहीं, उत्तरदायित्व
हर राजनीतिक दल में अच्छे और कमजोर दोनों प्रकार के निर्णय हो सकते हैं। हर नेता में कुछ गुण और कुछ सीमाएँ हो सकती हैं।
इसलिए किसी नेता को देवता बना देना लोकतंत्र के लिए उतना ही खतरनाक है, जितना किसी नेता को हर परिस्थिति में खलनायक घोषित कर देना।
नेता से असहमति देशद्रोह नहीं है।
नेता का समर्थन अंधभक्ति नहीं होना चाहिए।
और नेता की आलोचना भी व्यक्तिगत वैमनस्य में नहीं बदलनी चाहिए।
सच्चा नेतृत्व आलोचना से डरता नहीं, बल्कि आलोचना से सीखता है।
लोकतंत्र में मजबूत नेता वही नहीं जो भीड़ को आकर्षित कर सके; मजबूत नेता वह भी है जो कठिन समय में सही निर्णय ले सके और अपने निर्णय के परिणामों की जिम्मेदारी स्वीकार करे।
मीडिया की भी परीक्षा है
आज प्रश्न केवल राजनेताओं से नहीं है।
मीडिया से भी है।
क्या समाचार और विचार के बीच स्पष्ट अंतर रखा जा रहा है?
क्या सनसनी को सत्य पर प्राथमिकता दी जा रही है?
क्या टीआरपी और क्लिक के दबाव में समाज के वास्तविक प्रश्न पीछे छूट रहे हैं?
पत्रकारिता का दायित्व केवल सत्ता से प्रश्न करना नहीं है। पत्रकारिता का दायित्व सत्य के प्रति जवाबदेह रहना है।
सत्ता पक्ष की खबर हो या विपक्ष की, समर्थन में हो या विरोध में—तथ्य की कसौटी समान होनी चाहिए।
चाणक्य का दर्पण आज हमारे सामने है
आचार्य चाणक्य के इस श्लोक को केवल राजनीति की नीति मानना उसके व्यापक अर्थ को सीमित करना होगा।
यह श्लोक प्रत्येक नागरिक से कहता है—
अपनी बुद्धि का उपयोग करो।
किसी नेता की बात सुनो—लेकिन सोचो स्वयं।
किसी समाचार को पढ़ो—लेकिन जांचो स्वयं।
किसी विचारधारा को समझो—लेकिन प्रश्न करना मत छोड़ो।
किसी सरकार की उपलब्धि स्वीकार करो—लेकिन उसकी कमियों पर भी प्रश्न करो।
विपक्ष की आलोचना सुनो—लेकिन उसके तर्क को भी तथ्यों की कसौटी पर परखो।
और सबसे महत्वपूर्ण—
अपने विचार से असहमति रखने वाले व्यक्ति को शत्रु मत समझो।
दिव्य रश्मि का स्पष्ट मत
आज भारत को किसी एक दल के पक्ष या विपक्ष में अंधी भीड़ की आवश्यकता नहीं है।
भारत को चाहिए—
जागरूक नागरिक,
जिम्मेदार नेतृत्व,
स्वतंत्र एवं तथ्यपरक पत्रकारिता,
विवेकशील शिक्षा,
और स्वस्थ लोकतांत्रिक संवाद।
हम सरकार की उपलब्धियों की प्रशंसा भी करेंगे और आवश्यकता पड़ने पर उसकी आलोचना भी।
हम विपक्ष के सवालों को स्थान भी देंगे और उसके तर्कों की जांच भी करेंगे।
हम सोशल मीडिया की स्वतंत्रता का समर्थन करेंगे, लेकिन फर्जी सूचना और भ्रामक प्रचार के विरुद्ध नागरिक विवेक की आवश्यकता भी बताएंगे।
क्योंकि लोकतंत्र में न तो सत्ता अंतिम सत्य है, न विपक्ष; अंतिम कसौटी है—जनहित, संविधान, तथ्य और राष्ट्रहित।
चाणक्य का दर्पण आज भी हमारे सामने है।
अब सवाल यह नहीं है कि दर्पण साफ है या नहीं।
सवाल यह है कि हमारी आँखें कितनी खुली हैं।
और शायद आज के भारत के लिए चाणक्य की सबसे बड़ी सीख यही है—
“अंधसमर्थन से लोकतंत्र मजबूत नहीं होता; जागरूक और विवेकशील नागरिक से होता है।”
डॉ. राकेश दत्त मिश्र
संपादक, दिव्य रश्मि
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

0 टिप्पणियाँ
दिव्य रश्मि की खबरों को प्राप्त करने के लिए हमारे खबरों को लाइक ओर पोर्टल को सब्सक्राइब करना ना भूले| दिव्य रश्मि समाचार यूट्यूब पर हमारे चैनल Divya Rashmi News को लाईक करें |
खबरों के लिए एवं जुड़ने के लिए सम्पर्क करें contact@divyarashmi.com
#NEWS,
#hindinews