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हृदय के प्रेम-सरोवर में, छवि तुम्हारी उतर रही

हृदय के प्रेम-सरोवर में, छवि तुम्हारी उतर रही

कुमार महेंद्र
हृदय के पावन मौन में,
कोई मृदुल राग जग रहा।
सूना-सूना था जो जीवन,
आज तुम्हीं से सज रहा।
मन की गहरी वीणा पर,
प्रेम-धुनियाँ मधुर झर रही।
हृदय के प्रेम-सरोवर में, छवि तुम्हारी उतर रही।।


लहरें जो कल तक मौन थीं,
आज तराने गा रहीं।
साँसें तुम्हारी छुअन पाकर,
चंदन-सी महका रहीं।
बनकर मेरी आराधना तुम,
रूह में ऐसे सँवर रही।
हृदय के प्रेम-सरोवर में, छवि तुम्हारी उतर रही।।


पलकों की इस देहरी पर,
ठहर गया जैसे समाँ।
जैसे धरा की बाँहों में,
उतर आया हो आसमाँ।
अंतर्मन के मौन प्रकोष्ठ में,
तेरी सुधियाँ दीप धर रही।
हृदय के प्रेम-सरोवर में, छवि तुम्हारी उतर रही।।


नज़रें झुकीं तो यूँ लगा,
जैसे दुआएँ मिल गईं।
तुम जो करीब आए मेरे,
प्रेम-कुसुम की कलियाँ खिल गईं।
अब दूरियों का भय नहीं,
मिलन-आस मन में निखर रही।
हृदय के प्रेम-सरोवर में, छवि तुम्हारी उतर रही।।


रात हुई तो चाँदनी भी,
तेरा ही संदेशा लाई।
तारों की झिलमिल में मैंने,
तेरी ही तस्वीर पाई।
हर धड़कन के स्पंदन में,
तेरी चाहत प्रखर रही।
हृदय के प्रेम-सरोवर में, छवि तुम्हारी उतर रही।।


प्रेम अगर पूजा है मेरी,
तुम उसका पावन विश्वास।
तुमसे ही मधुमास खिला है,
तुमसे ही जीवन में उल्लास।
हर धड़कन में तुम ही तुम हो,
प्रणय-तरंग बनकर लहर रही।
हृदय के प्रेम-सरोवर में, छवि तुम्हारी उतर रही।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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