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हे गणपति, कृपा-वृष्टि करो अपार

हे गणपति, कृपा-वृष्टि करो अपार

कुमार महेंद्र
मधुर-मधुर हृदय-तरंगें,
स्वर में श्रृंगार अनुपम।
विमल वाणी, ओजस्वी गायन,
ज्योतित हो अंतर्मन।
मानस-सर में नवरस लहरें,
गूँजे मधुमय गान बहार।
हे गणपति, कृपा-वृष्टि करो अपार।।


दुर्बलता, छल, बल, मद-माया,
व्याप्त हुई जग-जन में।
प्रदत्त करो निर्मल मति ऐसी,
तम हर जाए कण-कण में।
नवगति, नवलय, नव चेतना,
नव-दृष्टि, नवल ज्ञान-संचार।
हे गणपति, कृपा-वृष्टि करो अपार।।


हे वक्रतुण्ड करुणामय,
दया-नीर कुछ छलका दो।
प्यासे नयनों के अंतर में,
निज स्वरूप झलका दो।
पुलकित पुनीत चरण-स्मरण से,
अष्ट-प्रहर हो दर्शन-साकार।
हे गणपति, कृपा-वृष्टि करो अपार।।


स्वर्णिम हो जीवन की बेला,
सर्वत्र मोद-उल्लास।
आजीवन बरसे कृपा तुम्हारी,
अटल रहे आस्था-विश्वास।
प्रेम-सुमन महकें जीवन में,
भर दो सुख-समृद्धि भंडार।
हे गणपति, कृपा-वृष्टि करो अपार।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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