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पत्नी के बिना पुरुष का जीवन - एक ऐसा अकेलापन, जिसे शब्दों में कहना कठिन है

पत्नी के बिना पुरुष का जीवन - एक ऐसा अकेलापन, जिसे शब्दों में कहना कठिन है

डॉ. राकेश दत्त मिश्र
कहा जाता है कि पति के जाने के बाद एक स्त्री विधवा हो जाती है, लेकिन बहुत कम लोग यह समझने की कोशिश करते हैं कि जब एक पुरुष की पत्नी चली जाती है, तो उसके जीवन से केवल एक व्यक्ति नहीं जाता-उसके जीवन का एक पूरा संसार उजड़ जाता है।

विधवा स्त्री के संघर्ष कम नहीं होते। उसे भी समाज, परिवार, आर्थिक परिस्थितियों और भावनात्मक पीड़ा से जूझना पड़ता है। लेकिन एक पुरुष के लिए पत्नी के बिना जीवन की कठिनाई का एक अलग ही रूप होता है, जिसे अक्सर समाज देख नहीं पाता।

पुरुष जीवन भर मजबूत बने रहने का अभिनय करता है।

वह परिवार के लिए कमाता है, बच्चों के सामने हिम्मत दिखाता है, रिश्तेदारों के सामने सामान्य रहने की कोशिश करता है। लेकिन जब वही पत्नी, जिसके साथ उसने जीवन के वर्षों को साझा किया था, अचानक साथ छोड़ देती है, तब उस पुरुष के भीतर एक ऐसा खालीपन पैदा होता है जिसे कोई दूसरा रिश्ता आसानी से भर नहीं सकता।

पत्नी केवल जीवनसंगिनी नहीं होती।

वह घर की धड़कन होती है।

सुबह उठने पर किसी का पूछना-“चाय लेंगे?”
दोपहर में किसी का कहना-“खाना खा लीजिए।”
बाहर से लौटने पर किसी का इंतजार करना।
बीमारी में दवा का ध्यान रखना।
बिना कहे मन की बात समझ लेना।

ये छोटी-छोटी बातें उस समय बहुत सामान्य लगती हैं, लेकिन जब वही आवाज हमेशा के लिए खामोश हो जाती है, तब पता चलता है कि घर में एक व्यक्ति नहीं, पूरा जीवन था।

पत्नी के जाने के बाद पुरुष के पास घर तो रहता है, लेकिन घर जैसा एहसास नहीं रहता।

कमरे वही होते हैं।
कपड़े वही होते हैं।
बिस्तर वही होता है।
रसोई वही होती है।
दीवारें वही होती हैं।

बस एक इंसान नहीं होता।

और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि समाज पुरुष से कहता है-“मजबूत बनिए।”

कोई यह नहीं पूछता कि रात को अकेले कमरे में जाकर वह कितना रोता है।

पुरुष की आंखों में आंसू देखकर लोग असहज हो जाते हैं। इसलिए वह रोता भी है तो अक्सर अकेले।

बच्चों के सामने मुस्कुराता है, रिश्तेदारों के सामने सामान्य रहता है और बाहर की दुनिया के सामने अपने आपको व्यस्त रखता है। लेकिन रात के सन्नाटे में जब मोबाइल की स्क्रीन बंद होती है और घर में कोई आवाज नहीं होती, तब पत्नी की याद सबसे ज्यादा सताती है।

कभी उसका कोई पुराना संदेश दिखाई देता है।

कभी अलमारी में उसकी साड़ी दिखाई देती है।

कभी उसकी पसंद की कोई चीज सामने आ जाती है।

कभी अचानक लगता है कि अभी वह दरवाजा खोलकर कहेगी—
“इतनी देर कहाँ लगा दी?”

लेकिन दरवाजा नहीं खुलता।

और तब आदमी समझता है कि मृत्यु केवल किसी व्यक्ति को नहीं ले जाती, वह जीवन की बहुत सारी आदतें भी अपने साथ ले जाती है।

पत्नी के बिना पुरुष को केवल भावनात्मक सहारा नहीं खोना पड़ता। उसे जीवन की उन अनगिनत छोटी जिम्मेदारियों से भी अकेले जूझना पड़ता है जिन्हें वह कभी पत्नी के साथ बांटकर चल रहा था।

किससे सलाह लें?

किससे मन की बात कहें?

किससे अपनी परेशानी छिपाएं?

किसके लिए तैयार होकर घर लौटने की जल्दी करें?

और सबसे बड़ा प्रश्न—

अब किसके लिए जिएं?

बच्चे होते हैं, परिवार होता है, मित्र होते हैं, रिश्तेदार होते हैं। लेकिन पत्नी का स्थान कोई नहीं ले सकता।

क्योंकि पत्नी केवल रिश्ते का नाम नहीं है।

वह साथ है।

वह वह व्यक्ति है जिसके सामने पुरुष को मजबूत होने की जरूरत नहीं पड़ती।

वह रो सकता है, हार सकता है, परेशान हो सकता है, चुप रह सकता है-और फिर भी उसे स्वीकार किया जाता है।

शायद इसी कारण पत्नी को खोने के बाद पुरुष की सबसे बड़ी पीड़ा उसका अकेलापन नहीं, बल्कि यह एहसास होता है कि अब उसकी जिंदगी में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं रहा जिसके सामने वह बिना किसी मुखौटे के स्वयं हो सके।

इसलिए यदि आपके आसपास कोई ऐसा पुरुष है जिसने अपनी पत्नी को खो दिया है, तो उससे केवल यह मत कहिए-

“समय सब ठीक कर देगा।”

कभी उसके पास बैठिए।

उसकी बातें सुनिए।

उसे रो लेने दीजिए।

उसे बार-बार मजबूत बनने की सलाह मत दीजिए।

क्योंकि कुछ रिश्तों की कमी समय के साथ कम नहीं होती, बस इंसान उस कमी के साथ जीना सीख जाता है।

और शायद पत्नी को खो चुके पुरुष की जिंदगी का सबसे बड़ा सत्य यही है-

वह जीता जरूर है, लेकिन उसके जीवन का एक हिस्सा हमेशा उस इंसान के साथ चला जाता है, जिसे वह सबसे ज्यादा अपना मानता था।

कुछ लोग चले जाते हैं,
लेकिन उनके जाने के बाद भी वे हमारे भीतर सांस लेते रहते हैं।

और पत्नी...

वह तो अक्सर पुरुष के जीवन की वह कहानी होती है,
जिसका अंत उसके चले जाने के बाद भी कभी नहीं होता।

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