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धरा गगन गूंज रही

(देश के सबसे बड़े रानी सती मंदिर के वार्षिक पूजन के अवसर पर कुछ पंक्तियां सादर निवेदित हैं 🙏)

धरा गगन गूंज रही, रानी सती दादी की जय जयकार

कुमार महेंद्र
वीर प्रसूता धरा झुंझुनूं,
गोदी में सोहे पावन धाम।
भाद्रपद की दिव्य अमावस,
पूज रही दुनिया अविराम।
लोक-हृदय में धर्म-आस्था,
मातृ-कृपा की अमृत-धार।
धरा गगन गूंज रही, 
रानी सती दादी की जय जयकार।।


प्रबुद्ध प्रवासी और स्थानीय,
दर्शन पाकर भाव-विभोर।
दादी की पावन गाथा का,
छाया कौतुक चारों ओर।
घट-घट में नारायणी माँ का,
बरस रहा स्नेह-दुलार।
धरा गगन गूंज रही, 
रानी सती दादी की जय जयकार।।


शौर्य-त्याग का अमर गौरव,
जन-जन के मन में उल्लास।
आन-बान और नारी-मर्यादा,
प्रेरणादायी स्वर्णिम इतिहास।
नारायणी के शक्ति-स्वरूप की,
कृपा बरसे सदा अपरंपार।
धरा गगन गूंज रही, 
रानी सती दादी की जय जयकार।।


ग्राम-नगर की मिश्रित आभा,
रग-रग में उत्साह-उमंग।
शुभ मंगल वार्षिकी महोत्सव,
बिखरा श्रद्धा का नव रंग।
कोटि-कोटि नमन दादी श्री चरण,
जनमानस का करो उद्धार।
धरा गगन गूंज रही, 
रानी सती दादी की जय जयकार।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)

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