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घर में दुखों की महफिल सजी है

घर में दुखों की महफिल सजी है

जय प्रकाश कुवंर

घर में दुखों की महफिल सजी है,
धैर्य रख झेलते जा रहा हूँ।
घबराने रोने से कुछ होगा नहीं,
फर्ज अदा करते हुए मुस्करा रहा हूँ।।
दुख की चिंता जब ज्यादा सताती है,
दुखी मन को यह समझाता हूँ।
दुख सुख कहीं भी जादे ठहरता नहीं,
इसलिए दुख में भी नहीं घबराता हूँ।।
जीवन सुख दुख का मिलन बिछुड़न है,
दोनों ही बारी बारी आता जाता है।
कभी सुख ज्यादा, कभी दुख ज्यादा,
यह हकीकत देख और सोच कर,
मन अत्यधिक नहीं घबराता है।।
संसार में देव दानव मानव सब ने,
समान रूप से सुख दुख झेला है।
इसलिए ऐ दुखी मन धीरज धर,
मुस्कुरा, क्योंकि तू नहीं अकेला है।।

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