आर्य समाज नवादा के वार्षिक उत्सव के अवसर पर किया गया सामवेद पारायण यज्ञ : जन्माष्टमी पर्व पर किया गया श्री कृष्ण जी का पावन स्मरण

दनकौर। यहां स्थित आर्य समाज नवादा में आर्य प्रतिनिधि सभा जनपद गौतम बुद्ध नगर के तत्वावधान और वेद प्रचारिणी सभा व धर्म आर्य सभा जनपद गौतम बुध नगर के सौजन्य से सामवेद पारायण यज्ञ का आयोजन किया गया है।
इस यज्ञ के ब्रह्मा आर्य जगत के सुप्रसिद्ध संन्यासी स्वामी सत्यव्रतानंद जी हैं। स्वामी जी महाराज ने अपने संबोधन में उपस्थित धर्म प्रेमी सज्जनों का मार्गदर्शन करते हुए कहा कि
ऋक्, यजुः, साम और अथर्व - ये चार मंत्र संहिताएं ही ‘वेद’ के नाम से जानी जाती हैं। वेद अपौरुषेय हैं। वेदों के अतिरिक्त जो पुस्तक मनुष्यों के द्वारा लिखी गई है उन्हें हम पौरुषेय कहते हैं। उन्होंने कहा कि वेदों में ज्ञान, कर्म और उपासना - ये चार विषयों का अथवा ईश्वर, जीव और प्रकृति (तथा प्रकृति से उत्पन्न सृष्टि) के संबंध में निर्भ्रान्त ज्ञान वर्णित है। वेद का मार्ग ही वह मार्ग है जिससे हम मोक्ष पद प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि वेदों में इतिहास ढूंढना गलती होगी। वेदों में तीन पदार्थों को अनादि और नित्य माना गया है - ईश्वर, जीव और प्रकृति। इन तीनों पदार्थ की सत्ता कभी भी समाप्त नहीं होती। यही कारण है कि इन तीनों का कभी भी अभाव नहीं होता है। इन तीनों सत्ताओं को अनादि माना गया है। सनातन होता भी वही है जो सदा नित नूतन रहता है।
स्वामी जी महाराज ने कहा कि ईश्वर ,जीव और प्रकृति अपरिवर्तनशील बनी रहती हैं। इनमें से ईश्वर और जीव दोनों चेतन हैं। जबकि प्रकृति जड़ है। हमको मोक्ष प्राप्त हो, इसलिए परमपिता परमेश्वर जड़ प्रकृति से सृष्टि बनाता है।
वेदों की मान्यता है कि यह सृष्टि सप्रयोजन है। मनुष्य को संसार में रहते हुए अभ्युदय की प्राप्ति और नि:श्रेयस की सिद्धि करने के लिए सदा शुभ कर्मों में लीन रहना चाहिए।
वैदिक संस्कृति में निराशावाद के लिए तनिक भी स्थान नहीं है। स्वामी जी महाराज ने कहा कि हम आशावादी और उत्साही जीवन जीने के अभ्यासी हैं। राष्ट्रीय संगठन और एकता को मजबूत करने के लिए वेद का राष्ट्रवाद अनुपम है। वेद कर्मठ जीवन जीने की प्रेरणा देता है। वेद एक देव और एक देश का समर्थन करते हैं। एक भाषा एक वेश वेद का संकल्प है। इसी से राष्ट्रवाद की भावना को बलवती किया जा सकता है।.jpeg)
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आचार्य दशरथ कुमार ने कहा कि वेद की हिंसा अहिंसा की रक्षा हेतु की जाती है। इसीलिए वैदिकी हिंसा हिंसा नहीं होती बल्कि वह मानव समाज की व्यवस्था को सुव्यवस्थित बनाए रखने के लिए की जाती है। वेद के प्रत्येक मंत्र में हमें सुव्यवस्था और नीति का पाठ पढ़ने को मिलता है। जिससे मानव जीवन को हम उन्नत बना सकते हैं। ज्ञान कर्म और उपासना में उन्नति का सतत प्रवाह बना रहता है। ऐसा किसी अन्यत्र संस्कृति में देखने को नहीं मिलता। इसीलिए भारत की वैदिक संस्कृति को विश्ववारा संस्कृति कहा गया है। वेद सत्य और ज्ञान विद्याओं की पुस्तक है।
छवि सनातनी ने भजनों के माध्यम से लोगों का मार्गदर्शन किया। उन्होंने कहा कि भारत के वीर सपूतों ने अपना बलिदान देकर देश को आजाद कराया। हमारी संस्कृति शास्त्र और शस्त्र की संस्कृति है। जिसमें जितना शास्त्र का मूल्य है उतना ही शस्त्र का भी मूल्य है। इस प्रकार की सोच से पता चलता है कि शास्त्र की रक्षा करने के लिए शस्त्र ही आ गया आता है। अतः भारत के लोगों को अपने पूर्वजों से शिक्षा लेनी चाहिए और जब राष्ट्र, धर्म व संस्कृति की रक्षा की बात आए तो उन्हें निसंकोच गांधीवादी अहिंसा को छोड़कर वेद की हिंसा का मार्ग अपनाना चाहिए ।
आर्य प्रतिनिधि सभा उत्तर प्रदेश की न्याय सभा के प्रधान न्यायाधीश और आर्य उप प्रतिनिधि सभा जनपद गौतम बुद्ध नगर के अध्यक्ष डॉ राकेश कुमार आर्य ने अपने संबोधन में कहा कि कोई भी युद्ध बड़ी-बड़ी सेनाओं से नहीं जीता जाता है और ना ही बड़े-बड़े हथियारों से जीता जाता है । युद्ध जीतने के लिए उत्साह की आवश्यकता होती है । जिस टीम और जिस संगठन के पास उत्साह नाम का कवच होता है वह अवश्य ही सफलता को प्राप्त होती है अर्थात युद्ध क्षेत्र में जीतती है। उन्होंने कहा कि महर्षि दयानंद जी महाराज ने अपने जीवन काल में अनेक विषम परिस्थितियों को देखा लेकिन उत्साह के साथ जीवन जीते हुए हर मुश्किल पर उन्होंने जीत भी प्राप्त की। उन्होंने कहा की नीति निपुण लोग यद्यपि आपकी किसी बात पर भी आलोचना कर सकते हैं। परंतु हमें उनकी आलोचना की ओर ध्यान नहीं देना चाहिए बल्कि अपनी मेहनत और लगन से अपने लक्ष्य की प्राप्ति की साधना में लगे रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत की वैदिक संस्कृति में जिस वर्ण व्यवस्था को स्थान दिया गया है वह बहुत ही वैज्ञानिक है ।इसमें कोई भी व्यक्ति ब्राह्मण से शूद्र और शूद्र से ब्राह्मण बन सकता है। हम सबको उत्साहित जीवन जीना चाहिए और अपनी वैदिक ऋषि संस्कृति का प्रचार प्रसार करने के लिए संपूर्ण संसार को आर्य बनाने का काम करना चाहिए।
वक्ताओं ने कहा कि वेदों का मर्म समझने के लिए ब्राह्मण-ग्रंथ, वेदांग, उपांग, उपवेद, प्रमुख – मौलिक उपनिषद् तथा मनुस्मृति आदि पुरातन वैदिक ग्रंथो का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है। आप जिस प्रकार इस ग्रंथ के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है वह शर्मनाक है। वेद की शिक्षा से मनुष्य के भीतर उदात्त, सार्वभौम, सर्वजनोपयोगी और प्राणीमात्र के लिए हितकारी भावों का उदय होता है।
इस पारायण यज्ञ में बड़ी संख्या में दूर-दूर से चलकर आए हुए लोगों ने आहुतियां डाली। ज्ञात रहे कि आर्य समाज नवादा की ओर से इस परंपरा का निर्वाह करने के लिए संकल्प लिया गया है कि श्री कृष्ण जी के बारे में व्याप्त भ्रांतियों का समाधान करने के लिए प्रतिवर्ष इस प्रकार के आयोजन किए जाएंगे। जिससे लोग श्री कृष्ण जी जैसे महायोगी तपस्वी महापुरुष पर माखन चोर या कपड़ा चुराने वाला या श्याम चूड़ी बेचने आया... जैसे अभद्र आरोप लगाने छोड़ दें। इस बारे में जानकारी देते हुए वेद प्रचारिणी सभा के जिलाध्यक्ष विजेंद्र सिंह आर्य ने कहा कि इस गांव के लोगों का उत्साह देखते ही बनता है। उन्होंने कहा कि गांव के मास्टर विजय सिंह आर्य धर्मवीर सिंह, राजीव कुमार ,अरविंद कुमार, माता भगवती देवी, श्रीमती रीता आर्य जैसे अनेक धर्म प्रेमी भाई बहनों का विशेष आशीर्वाद रहा जिसके कारण यह महान कार्य संपन्न हो सका। उन्होंने कहा कि लोगों के भीतर अपने वेदों के प्रति और वैदिक संस्कृति के प्रति श्रद्धा कूट-कूट कर भरी है। उसी का परिणाम है कि वह योगीराज श्री कृष्ण जी महाराज के जन्मोत्सव को बड़ी श्रद्धा से वैदिक मित्रों के साथ डाली गई आहुतियां के साथ मना रहे हैं। दूसरे दिन की दूसरी संध्या में आर्य प्रतिनिधि सभा के जिला उपाध्यक्ष महावीर सिंह आर्य, महेंद्र सिंह आर्य, चरण सिंह आर्य, ब्रह्म सिंह आर्य, हरिकिशन आर्य, हरस्वरूप आर्य, आर्य समाज सिकंदराबाद के प्रधान रमेश सिंह आर्य, पुरोहित सुरेंद्र सिंह आर्य गुरुकुल गौतम नगर के वेदपाठी ब्रह्मचारी और बड़ी संख्या में मातृशक्ति उपस्थिति रही।
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