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जिससे भगवान सन्तुष्ट नहीं होते वह शास्त्र और ज्ञान अधूरा है - श्री त्रिपुष्कर जी महाराज

जिससे भगवान सन्तुष्ट नहीं होते वह शास्त्र और ज्ञान अधूरा है - श्री त्रिपुष्कर जी महाराज

  • द्वारका मंदिर में श्रीमदभागवत कथा का दूसरा दिन
पटना 2 सितम्बर 2026
द्वारका मंदिर, आनन्दपुरी, बोटिंग रोड में आयोजित श्रीमद्‌भागवत कथा के दूसरे दिन कथा के यजमान सुनील कुमार तिवारी ने पूर्वाहन में विहित पूजन किया l पं. रुद्राक्ष शास्त्री ने पूर्वाहन से आरम्भ कर मध्याह्‌ण तक दूसरे दिन का श्रीमद्‌भागवत महापुराण का पारायण पाठ किया । अपराह्ण में व्यास पीठ पर कथाव्यास का स्वागत पूजन यजमान सपत्नी सहित नीरज कुमार एवं आयोजन की व्यवस्था से जुड़े श्रद्धालुओं ने किया। दूसरे दिन की कथा प्रसंग का वर्णन करते हुए कथा व्यास श्री त्रिपुष्कर जी महाराज ने शुकदेव जन्म, कुन्ती-भीम चरित की कथा का प्रसंग वर्णन किया l
उन्होंने प्रसंग वर्णन करते हुए कहा - भगवान व्यास ने वेद को चार भागों में विभक्त किया वेद के गूढ़ ज्ञान को सबके लिए जानने योग्य बनाया । इतिहास पुराण का ज्ञान सुलभ कराने के लिए महाभारत की रचना की l फिर भी उनका हृदय संतुष्ट नहीं हुआ । इसका कारण वे नहीं जानते थे। यह जानने के लिए व्यास जी ने देवर्षि नारद से इच्छा व्यक्त की ।
नारद जीने कहा आप ने महाभारत रचकर सबके लिए धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष पुरुषार्थ का मार्ग दिखा दिया है। सनातन ज्ञान और ब्रह्मज्ञान भी आपने बता दिया है। आपको भगवान के यश का गुणगान करना चाहिए। इस संबंध में भागवत वचन है-
भक्तानुदितप्रायं यशो भगवतोऽमलम ।
ये नैवासौ न तुष्येत मन्ये तद्दर्शनं खिलम् ।lनारदजी कहते हैं है व्यास जी! आपने भगवान के निर्मल यश का गुणगान नहीं किया है। मेरा मानना है कि जिससे भगवान सन्तुष्ट नहीं होते वह शास्त्र और वह ज्ञान अधूरा है l धर्म आदि पुरुषार्थ का जैसा अर्थ स्पष्ट किया है वैसा श्री कृष्ण की महिमा का नहीं किया है। जिस भाव, रस और अलंकार से भगवान का यश गान होना चाहिए, आप वैसा कीजिए। जो वाणी भगवान के सुयश से युक्त होता है वह वाणी सुनने से सुनने वाले श्रद्धालुओं के सभी पाप मिट जाते हैं उसके जीवन में पुण्य का उदय होता है l ऐसा पुण्य जो निर्मल ज्ञान और मोक्ष प्राप्ति का साधन है l हे व्यास जी! लीला पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण के प्रति अपने सभी कर्मो को समर्पित कर देने से ही दैहिक, दैविक एवं भौतिक तीनों तापों से मुक्ति मिलती है l मानव मात्र के लिए तपस्या, वेदों का अध्ययन, यज्ञ आदि कर्म, ज्ञान और दान का एक मात्र प्रयोजन यही है कि भगवान के गुणों और लीलाओं का वर्णन किया जाय l भजन मंडली कलाकारों ने प्रसंगों पर आधारित भजनों की प्रस्तुति से भक्ति भाव का अलख जगाया l
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