नारी का हाथ जोड़ना, जैसे प्रकृति का नियम तोड़ना
कुमार महेंद्रसिंहवाहिनी, शक्तिस्वरूपा,
जग को राह दिखाती है।
जिसकी भृकुटि तनते ही,
कालरात्रि भी थर्राती है।
शक्ति जगाओ, शौर्य जगाओ,
गगन-शिखर से नाता जोड़ना।
नारी का हाथ जोड़ना,
जैसे प्रकृति का नियम तोड़ना।।
जो जननी महाकालों की,
रणचंडी की परिभाषा है।
जिसके आँचल में पलता जग,
वह सृष्टि की नव आशा है।
जिसके हाथों सृजन-डोर है,
उसे याचना में मत छोड़ना।
नारी का हाथ जोड़ना,
जो जननी महाकालों की,
रणचंडी की परिभाषा है।
जिसके आँचल में पलता जग,
वह सृष्टि की नव आशा है।
जिसके हाथों सृजन-डोर है,
उसे याचना में मत छोड़ना।
नारी का हाथ जोड़ना,
जैसे प्रकृति का नियम तोड़ना।।
अन्यायों के सम्मुख झुकना,
कब तक होगा मौन तुम्हारा?
सत्य-धर्म की राह पकड़कर,
तुम ही बनना स्वयं सहारा।
शस्त्र नहीं तो शब्द जगाओ,
अन्यायों का तिमिर झकझोरना।
नारी का हाथ जोड़ना,
अन्यायों के सम्मुख झुकना,
कब तक होगा मौन तुम्हारा?
सत्य-धर्म की राह पकड़कर,
तुम ही बनना स्वयं सहारा।
शस्त्र नहीं तो शब्द जगाओ,
अन्यायों का तिमिर झकझोरना।
नारी का हाथ जोड़ना,
जैसे प्रकृति का नियम तोड़ना।।
बहुत सह चुकी मौन व्यथाएँ,
बहुत सहे अपमानों के घाव।
सहनशीलता शक्ति तुम्हारी,
बनने न देना इसे दुर्बल भाव।
हाथ जोड़ना छोड़ो जननी,
अब आँधियों का रुख मोड़ना।
नारी का हाथ जोड़ना,
बहुत सह चुकी मौन व्यथाएँ,
बहुत सहे अपमानों के घाव।
सहनशीलता शक्ति तुम्हारी,
बनने न देना इसे दुर्बल भाव।
हाथ जोड़ना छोड़ो जननी,
अब आँधियों का रुख मोड़ना।
नारी का हाथ जोड़ना,
जैसे प्रकृति का नियम तोड़ना।।
जब तक तुम हुंकार न भरोगी,
जग तुमको झुकाता जाएगा।
जिस दिन जाग उठोगी भीतर,
हर पाखंड थर्राता जाएगा।
तुम प्रकृति की आदि शक्ति हो,
खुद को दुर्बल कभी न तोलना।
नारी का हाथ जोड़ना,
जब तक तुम हुंकार न भरोगी,
जग तुमको झुकाता जाएगा।
जिस दिन जाग उठोगी भीतर,
हर पाखंड थर्राता जाएगा।
तुम प्रकृति की आदि शक्ति हो,
खुद को दुर्बल कभी न तोलना।
नारी का हाथ जोड़ना,
जैसे प्रकृति का नियम तोड़ना।।
क्यों माँगे अधिकार किसी से,
जब अधिकार तुम्हारा है?
जिसने जग को जन्म दिया है,
उसका जग पर हक सारा है।
अपने श्रम, सम्मान, स्वाभिमान का,
सदा विजय-उद्घोष बोलना।
नारी का हाथ जोड़ना,
क्यों माँगे अधिकार किसी से,
जब अधिकार तुम्हारा है?
जिसने जग को जन्म दिया है,
उसका जग पर हक सारा है।
अपने श्रम, सम्मान, स्वाभिमान का,
सदा विजय-उद्घोष बोलना।
नारी का हाथ जोड़ना,
जैसे प्रकृति का नियम तोड़ना।।
तुम दुर्गा हो, तुम काली हो,
तुम लक्ष्मी, सरस्वती हो।
ममता की मधुरिम धारा भी,
तुम रण में प्रचंड शक्ति हो।
अपने भीतर सोई ज्वाला,
जगाकर जग का पथ मोड़ना।
नारी का हाथ जोड़ना,
तुम दुर्गा हो, तुम काली हो,
तुम लक्ष्मी, सरस्वती हो।
ममता की मधुरिम धारा भी,
तुम रण में प्रचंड शक्ति हो।
अपने भीतर सोई ज्वाला,
जगाकर जग का पथ मोड़ना।
नारी का हाथ जोड़ना,
जैसे प्रकृति का नियम तोड़ना।।
नारी केवल अबला कब है,
नारी तो आधार धरा का।
उसके साहस से ही खिलता,
हर उपवन संसार भरा का।
सम्मान मिले, अधिकार मिले,
नव इतिहास के पन्ने खोलना।
नारी का हाथ जोड़ना,
नारी केवल अबला कब है,
नारी तो आधार धरा का।
उसके साहस से ही खिलता,
हर उपवन संसार भरा का।
सम्मान मिले, अधिकार मिले,
नव इतिहास के पन्ने खोलना।
नारी का हाथ जोड़ना,
जैसे प्रकृति का नियम तोड़ना।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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