तमिलनाडु सरकार के निर्णय और हिंदू धर्म
डॉ राकेश कुमार आर्य
संविधान के अनुच्छेद 29 के अनुसार अल्पसंख्यकों के हितों को संरक्षण प्रदान किया गया है। इस अनुच्छेद की व्यवस्था है कि भारत के किसी भी क्षेत्र में रहने वाले नागरिकों के किसी भी वर्ग को अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति को बनाए रखने और संरक्षित करने का अधिकार है। अनुच्छेद 29(2) के तहत राज्य द्वारा संचालित या राज्य से सहायता प्राप्त किसी भी शैक्षणिक संस्थान में किसी भी नागरिक को केवल धर्म, मूलवंश, जाति, भाषा या इनमें से किसी भी आधार पर प्रवेश से नहीं रोका जाएगा।
अब संविधानिक अनुच्छेद 30 की बात करते हैं।अनुच्छेद 30 के अनुसार सभी धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और उनके प्रशासन का अधिकार होगा।अनुच्छेद 30(2) के तहत राज्य शैक्षणिक संस्थानों को सहायता देते समय इस आधार पर भेदभाव नहीं करेगा कि वह संस्थान किसी धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक के प्रबंधन के अधीन है। अनुच्छेद 30(1A) के अनुसार, यदि राज्य किसी अल्पसंख्यक संस्थान की संपत्ति का अधिग्रहण करता है, तो वह ऐसा मुआवजा देगा जिससे उस संस्थान के अधिकारों में कोई बाधा न आए।
संविधान के इन दोनों अनुच्छेदों का अनुचित लाभ उठाते हुए भारत में अल्पसंख्यक वर्ग ने अपेक्षा से कहीं अधिक लाभ उठाया है। इन संवैधानिक अनुच्छेदों की भाषा का अवलोकन करने से स्पष्ट है कि इनमें केवल इतनी व्यवस्था की गई है कि देश के अल्पसंख्यकों को भी अपने शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने की सुविधा उपलब्ध होगी। इनमें यह नहीं कहा गया है कि ऐसी सुविधा बहुसंख्यक समाज के लोगों को नहीं होगी। इसके उपरांत भी इन अनुच्छेदों का नकारात्मक अर्थ क्यों निकाला गया है ?
संविधान सभा के कई सदस्यों को यह आशंका थी कि जब देश स्वाधीन हो रहा है तो ऐसा न हो कि देश का बहुसंख्यक हिंदू अल्पसंख्यकों पर अत्याचार करने लगे। इसलिए जहां हिंदुओं को अपने शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने की सुविधा उपलब्ध होगी ( संविधान की इन दोनों धाराओं का अंतर्निहित अर्थ यही है ) वहीं अल्पसंख्यकों को भी यह सुविधा प्रदान की जाएगी। संविधान सभा के कई सदस्यों को विदेशी अनुभव दिखाई दे रहे थे, जहां पर किसी बहुसंख्यक वर्ग ने अल्पसंख्यकों के अधिकारों का शोषण किया अथवा उनके संवैधानिक मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगा दिया। यह स्थिति भविष्य में भारत में न आए, इसके लिए ही भारत के संविधान में अनुच्छेद 29 और 30 की व्यवस्था की गई थी। परंतु हमारे देश में राजनीतिक लोगों के द्वारा व्यवहार में इन दोनों अनुच्छेदों का बहुत ही गलत प्रयोग किया गया है। इन अनुच्छेदों के स्थापित होने का अभिप्राय यह लगाया गया कि अपनी धार्मिक शैक्षणिक संस्थाएं खड़ी करने का अधिकार केवल अल्पसंख्यकों को होगा, बहुसंख्यकों को नहीं । यदि बहुसंख्यक ऐसा करते हुए पाए जाते हैं तो समझो कि वह एक 'अपराध ' कर रहे हैं। इतना ही नहीं, अल्पसंख्यकों को अपने शैक्षणिक संस्थान खड़े करने का अधिकार देकर यह भी मान लिया गया कि अपने शैक्षणिक संस्थानों में वे जैसी भी शिक्षा दें - यह उनका विशेष अधिकार होगा। इस व्याख्या ने हमारे देश में कई प्रकार के खतरे खड़े कर दिए हैं। अधिकांश मुस्लिम मदरसों में आतंकवाद की शिक्षा दी जा रही है। देश विरोधी भावनाओं को भड़काने का काम किया जा रहा है। देश के बहुसंख्यक समाज के विरुद्ध मुस्लिम अपनी नई पीढ़ी को तैयार कर रहे हैं। कुल मिलाकर संविधान के ये दोनों अनुच्छेद कश्मीर संबंधी धारा 370 से भी अधिक खतरनाक सिद्ध हुए हैं और हो रहे हैं।
अब इन्हीं संवैधानिक अनुच्छेदों का सहारा लेकर तमिलनाडु की विजय सरकार ने बहुसंख्यकों अथवा सनातनियों पर नये अत्याचार करने आरंभ किए हैं। विजय सरकार ने मुस्लिम छात्रों के ट्यूशन को स्नातक की शिक्षा तक पूर्ण रूपेण नि:शुल्क कर दिया है। सरकारी स्कूलों या कॉलेजों से लेकर निजी स्कूलों तक में यह नियम लागू किया जाएगा। तमिलनाडु के वक्फ बोर्ड के द्वारा अभी तक यह व्यवस्था चली आ रही थी कि कक्षा 1 से 8 तक की मुस्लिम लड़कियों को छात्रवृत्ति दी जाती थी। अपनी बहुसंख्यक हिंदू विरोधी मानसिकता का प्रदर्शन करते हुए तमिलनाडु की विजय सरकार ने अब इस छात्रवृत्ति को मैट्रिक तक करने का निर्णय लिया है। इस छात्रवृत्ति की राशि भी अब 2000 रुपये कर दी गई है।
तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री विजय थलापति ईसाई हैं और वह उन ईसाई मिशनरीज के लिए खुलकर काम कर रहे हैं जो दक्षिण के इस राज्य का ईसाईकरण करने के काम में लगी रही हैं । यदि वैश्विक परिदृश्य पर चल रही राजनीति पर नजर दौड़ाई जाए तो ईसाई और मुस्लिम आपको सर्वत्र लड़ते हुए दिखाई देंगे। परंतु भारत में इन दोनों का साँझा शत्रु हिंदू है । उसके विनाश के लिए यह दोनों एक हो जाते हैं। यह बीमारी आज की नहीं है, अंग्रेजों के जमाने में भी यही बीमारी रही थी और इसी बीमारी ने देश का विभाजन करवाया था। जिसे देश के धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल न तो उस समय समझे थे और न आज समझ रहे हैं। इसलिए हिंदू विरोध के नाम पर हमारे देश में ये दोनों हाथ मिलाकर काम करते हैं । यही कारण है कि तमिलनाडु में मुसलमानों के समर्थन का तात्कालिक लाभ लेने के लिए विजय सरकार ने उनके लिए भी सुविधाओं के द्वार खोल दिए हैं। एक प्रकार से ईसाई और मुस्लिम दोनों का गठबंधन हिंदू विरोध के लिए बन चुका है। जितना भर भी सेक्युलरिस्ट गैंग भारत में काम कर रहा है, वह सारा का सारा धर्मनिरपेक्षता के नाम पर इस हिंदू विरोधी गठबंधन के विरुद्ध कुछ भी नहीं बोलेगा। यही कारण है कि विजय सरकार के इस निर्णय पर कांग्रेस के राहुल गांधी, सपा के अखिलेश यादव, तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी सहित सारे कम्युनिस्ट और धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल मौन साध गए हैं। इनका मौन ही वर्तमान भारत की राजनीति का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है।
तमिलनाडु की विजय सरकार का यह भी निर्णय है कि चेन्नई में आधुनिक सुविधाओं से संपन्न एक सरकारी कॉलेज लड़कियों के लिए खोला जाएगा। संवैधानिक अनुच्छेद 29, 30 की इस व्यवस्था के बावजूद भी कि धार्मिक आधार पर किसी भी वर्ग के साथ कोई अन्याय नहीं किया जाएगा तमिलनाडु में खोले जा रहे इस सरकारी कॉलेज में हिंदू लड़कियों को प्रवेश नहीं दिया जाएगा। ऐसी व्यवस्था संविधान की मूल आत्मा के विरुद्ध है। हमारे संविधान में व्यवस्था है कि देश के नागरिकों के मध्य जाति, धर्म और लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा। परंतु धर्मनिरपेक्षता के हिंदू विरोधी राजनीतिक सिद्धांत के चलते भारतवर्ष में संविधान के नाम पर ही संविधान की हत्या करने का यह क्रम संविधान लागू होने के पहले दिन से ही आरंभ हो गया था कि मुस्लिम तुष्टीकरण के नाम पर हिंदुओं के साथ जाति, धर्म और लिंग के आधार पर भेदभाव करना संविधान संगत होगा। कुछ इस प्रकार का नैरेटिव सेट किया गया है कि यदि आप ऐसे संविधान विरोधी कृत्यों के विरुद्ध कोई विरोध प्रदर्शन करते हैं या किसी प्रकार का मार्च निकालते हैं तो यह भी आपका अपने संविधानिक अधिकारों का प्रयोग करना नहीं माना जाता बल्कि इसे भी इस प्रकार प्रचारित किया जाता है कि आप असहिष्णु हैं और अपनी असहिष्णुता का परिचय देते हुए दूसरे लोगों को आप उन्नति करते हुए देखना नहीं चाहते। इसी प्रकार के नॉरेटिव के चलते देश में हिंदू अधिकारों के लिए काम करने से पहले लोग 10 बार सोचते हैं। जबकि अल्पसंख्यक वर्ग के लोग अपने वर्ग के लोगों के लिए काम करने के लिए उतने ही उतावले दिखाई देते हैं। तमिलनाडु सरकार के इस निर्णय से हिंदुओं को अपना धर्म त्यागने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकेगा । उनके स्वयं के भीतर भी यह भावना उत्पन्न होगी कि यदि वह सनातनी हैं तो उनकी उन्नति में यह सबसे बड़ी बाधा है। इसलिए क्यों नहीं इस बाधा को समाप्त कर दिया जाए ? जब वह यह देखेंगे कि उनके बचाव में कोई राजनीतिक दल, संस्था या संगठन काम करने के लिए भी नहीं आ रहा है तो वह और भी अधिक शीघ्रता से सनातन को छोड़ेंगे। बस, यही वह स्थिति है जिसे तमिलनाडु की वर्तमान विजय सरकार सहित प्रत्येक धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल चाहता है। ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि क्या हमको सनातनी लोगों को इन धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों की दया पर छोड़ दिया जाना चाहिए या हमारे संविधान में ऐसी स्थिति का सामना करने की क्षमता नहीं है ? क्या ऐसे अत्याचारों का सामना कर रहे तमिलनाडु के सनातनी लोगों के लिए काम करना देश के लोगों का और सरकार का काम नहीं है ? यदि है तो केंद्र सरकार इस पर मौन क्यों साधे बैठी है ?
शिक्षा क्षेत्र के अतिरिक्त तमिलनाडु की विजय सरकार 10,000 अल्पसंख्यकों के लिए अलग से कौशल विकास की योजनाएं चलाएगी, इसमें IT, ऑटोमोबाइल, ब्यूटी एंड वेलनेस, कढ़ाई, गारमेंट्स इंडस्ट्री आदि आदि को लेकर सिखाया जाएगा, उन्हें प्रैक्टिकल सिखाया जाएगा। दुर्भाग्य की बात यह है कि सरकार की इस योजना से भी हिंदू लड़के लड़कियों को दूर रखा जाएगा। विजय सरकार ने धार्मिक संस्थाओं को लेकर 100 करोड रुपए का फंड तैयार किया है। इस फंड का उपयोग अल्पसंख्यकों अर्थात मुस्लिमों और ईसाइयों के धार्मिक स्थानों के विकास के लिए किया जाएगा। इसके लाभार्थी बिना ब्याज के ऋण ले सकते हैं। जिससे वह अपने धार्मिक स्थलों का सुनियोजित विकास कर पाएंगे। इन्हें यह भी सुविधा होगी कि वह दुकानों, बाजारों , मॉल, मैरिज हॉल , शिक्षा और प्रशिक्षण केंद्र आदि में भी इस फंड की धनराशि का प्रयोग कर सकेंगे। सरकार की इस प्रकार की हिंदू विरोधी नीतियों के चलते तमिलनाडु में लगभग 12000 मंदिर ऐसे हैं जो बंद हो चुके हैं या जहां पर पूजा पाठ नहीं होता है। 34000 मंदिरों की स्थिति बहुत खराब है। कुल मिलाकर भारत का सेकुलर गैंग ऐसी व्यवस्था बना चुका है कि देश की राजनीति इस प्रकार की हिंदू मानसिकता के विरुद्ध चुप रहेगी और लोग कुछ कर नहीं पाएंगे। ... सनातन और हिंदू दोनों ही इस समय राम भरोसे हैं। मान लेते हैं कि तमिलनाडु के हिंदू राम भरोसे हैं तो क्या ' राम ' वालों की सरकार भी राम भरोसे ही है ? राम का मंदिर बनाने से काम नहीं चलेगा। इसके विपरीत राम के चरित्र को अपनाकर ही काम चलेगा अर्थात सनातन विरोधी शक्तियों के सामने राम की भांति सीना तानकर खड़ा होना होगा।
( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )
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