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साथ तेरा मिले तो प्रणय के प्रसून खिले

साथ तेरा मिले तो प्रणय के प्रसून खिले

कुमार महेंद्र
मौन थी हृदय-रागिनी,
तुमने छेड़े गीत।
सूनी थीं जीवन-राहें,
जागे मन के मीत।
मन-उपवन में पग धरकर,
साँसों में मलय पवन घुले।
साथ तेरा मिले तो प्रणय के प्रसून खिले।।


चितवन में सावन बसा,
अधरों पर मधुहास।
तुम जो आए पास मेरे,
थम गया हर श्वास।
मौन अधर भी कह उठे,
जब दो विरही मन मिले।
साथ तेरा मिले तो प्रणय के प्रसून खिले।।


तुम मेरी अर्चा हो,
तुम ही मेरी वंदना।
तुमसे जीवन-सुर सजा,
तुमसे मेरी साधना।
जन्म-जन्म का यह बंधन,
प्रेम-सुधा में सदा घुले।
साथ तेरा मिले तो प्रणय के प्रसून खिले।।


तुम नील गगन अनंत,
मैं धरती-सी प्यास।
तुम तृप्ति की वर्षा हो,
मैं युग-युग की आस।
तुम साथ रहो तो जीवन,
मधुर प्रणय-रस में ढले।
साथ तेरा मिले तो प्रणय के प्रसून खिले।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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