संस्कृत केवल अतीत की भाषा नहीं, वर्तमान और भविष्य की भी आधारशिला

- संस्कृत एकादशी के समापन समारोह में जनमानस में संस्कार, संस्कृति और संस्कृत के पुनरुत्थान पर हुआ गहन मंथन
प्रस्तुति : डॉ. सच्चिदानन्द प्रेमी, भारतीय विद्वत् परिषद्, गयाजी (बिहार)
गया। भारतीय विद्वत् परिषद्, मगध इकाई, गयाजी के तत्वावधान में डॉ. सच्चिदानन्द प्रेमी के संयोजकत्व में आयोजित ग्यारह दिवसीय संस्कृत दिवस समारोह ‘संस्कृत एकादशी’ का भव्य समापन 6 सितंबर 2026 को रमना स्थित धर्मसभा भवन में आयोजित धर्मसभा एवं विचार-गोष्ठी के साथ हुआ। ग्यारह दिनों तक चले इस विशेष आयोजन के अंतिम दिन संस्कृत भाषा के संरक्षण, संवर्धन, प्रचार-प्रसार तथा उसे पुनः जनजीवन की सहज भाषा बनाने के विषय पर विद्वानों, शिक्षाविदों, साहित्यकारों और समाजसेवियों ने गंभीर मंथन किया।
समापन समारोह का मुख्य परिचर्चा विषय ‘जनमानस में संस्कार की स्थापना’ रहा। वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि संस्कार केवल पुस्तकों अथवा उपदेशों से स्थापित नहीं होते, बल्कि परिवार, शिक्षा, भाषा और सामाजिक परिवेश के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी विकसित होते हैं। संस्कृत को इसी संस्कार-परंपरा का महत्वपूर्ण आधार बताते हुए इसे घर, विद्यालय, विश्वविद्यालय और समाज के दैनिक व्यवहार से जोड़ने का आह्वान किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता दया प्रकाश सरस्वती विद्या मंदिर के प्राचार्य आचार्य सत्यशेखर राय ने की। समारोह का उद्घाटन दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के वाणिज्य संकायाध्यक्ष डॉ. ब्रजेश कुमार ने दीप प्रज्वलित कर किया। इस अवसर पर प्रबुद्ध समाजसेविका उषा डालमिया ने समारोह में उपस्थित विद्वानों एवं शिक्षाविदों को अंगवस्त्रम और श्रीफल भेंट कर सम्मानित किया। कार्यक्रम का संचालन शोध छात्र नचिकेता वत्स ने किया।
संस्कृत हमारी जन्मभूमि की भाषा : डॉ. ब्रजेश कुमार
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि डॉ. ब्रजेश कुमार ने संस्कृत के महत्व को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में रेखांकित किया। उन्होंने पश्चिमी देशों में लैटिन भाषा के इतिहास का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार लैटिन ने यूरोप की बौद्धिक और शैक्षणिक परंपरा को लंबे समय तक प्रभावित किया, उसी प्रकार संस्कृत भारतीय ज्ञान परंपरा की मूल आधारभूत भाषा रही है।
उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि ज्ञान, चिंतन, दर्शन, विज्ञान और संस्कृति की विशाल परंपरा की संवाहक है। भारतीय भाषाओं के विकास में संस्कृत के योगदान को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि संस्कृत में ज्ञान की अनगिनत धाराएं विकसित हुई हैं। कंप्यूटर विज्ञान और आधुनिक मनोविज्ञान के संदर्भ में भी उन्होंने संस्कृत की संरचनात्मक विशेषताओं और संक्षिप्तीकरण की क्षमता को महत्वपूर्ण बताया।
संस्कृत का गौरवशाली अतीत ही नहीं, मजबूत वर्तमान भी : डॉ. कर्मानंद आर्य
विशिष्ट अतिथि एवं दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्राध्यापक डॉ. कर्मानंद आर्य ने संस्कृत के वर्तमान स्वरूप और भविष्य की संभावनाओं पर गंभीर विचार रखा। उन्होंने कहा कि “जिस समाज का वर्तमान नहीं होता, वह अतीत के सहारे जीता है, लेकिन संस्कृत के पास गौरवशाली अतीत के साथ-साथ एक मजबूत वर्तमान भी है।”
उन्होंने विश्वविद्यालय स्तर पर संस्कृत की नियमित पढ़ाई, शोध और विस्तार को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया। उनका कहना था कि केवल प्राचीन परंपराओं को संरक्षित करने तक सीमित रहने के बजाय वर्तमान पीढ़ी को संस्कृत से जोड़ना और उसके भविष्य को मजबूत करना अधिक आवश्यक है।
संस्कृत की शुरुआत घर से हो : डॉ. शशिभूषण मिश्र
महिला महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य डॉ. शशिभूषण मिश्र ने संस्कृत और संस्कृति के संरक्षण की शुरुआत परिवार से करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार बच्चा अपने घर-परिवार के वातावरण में सुनकर किसी भाषा को बोलना और समझना सीखता है, उसी प्रकार संस्कृत को भी घर के वातावरण का हिस्सा बनाया जा सकता है।
उन्होंने अभिभावकों से आग्रह किया कि बच्चों को संस्कृत के छोटे-छोटे शब्दों, श्लोकों और संवादों से बचपन से ही परिचित कराया जाए। उनके अनुसार संस्कृत को केवल परीक्षा का विषय बनाने के बजाय जीवन और परिवार के व्यवहार से जोड़ना होगा।
सप्ताह में एक दिन घर में हो संस्कृत संवाद : डॉ. रामकृष्ण मिश्र
प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. रामकृष्ण मिश्र ने संस्कृत को जनभाषा बनाने के लिए व्यावहारिक सुझाव दिए। उन्होंने कहा कि बच्चों को घर में सरल संस्कृत के शब्द, वाक्य और श्लोक सिखाए जाने चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि सप्ताह में कम से कम एक दिन परिवार में ‘संस्कृत दिवस’ के रूप में मनाया जाए और उस दिन घर के सदस्य आपस में यथासंभव संस्कृत में संवाद करें।
उन्होंने कहा कि संस्कृत को कठिन और केवल विद्वानों की भाषा मानने की मानसिकता को बदलना आवश्यक है। सरल संस्कृत के माध्यम से आम परिवार भी इस भाषा को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बना सकता है।
सरल संस्कृत में पुस्तकें प्रकाशित हों : डॉ. रामसिंहासन सिंह
वरीय साहित्यकार डॉ. रामसिंहासन सिंह ने जनमानस तक संस्कृत पहुंचाने के लिए सरल भाषा में पुस्तकों के प्रकाशन और व्यापक प्रसार की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि यदि संस्कृत साहित्य को आम पाठक की समझ के अनुरूप प्रस्तुत किया जाए तो समाज के बड़े वर्ग को इससे जोड़ा जा सकता है।
उन्होंने संस्कृत साहित्य के लोकप्रिय संस्करण तैयार करने, युवाओं के लिए सरल पुस्तकों का प्रकाशन करने तथा विद्यालयों में संस्कृत साहित्य के प्रति रुचि विकसित करने पर बल दिया।
युवाओं को संस्कृत और संस्कृति से जोड़ना जरूरी : पुण्यार्क
वक्ताओं में पुण्यार्क जी ने युवाओं और विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति की मूल चेतना से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान पीढ़ी को यदि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना है तो संस्कृत के माध्यम से ज्ञान और संस्कार की परंपरा को आगे बढ़ाना होगा। उन्होंने जीवन और समाज के उत्थान में संस्कृत एवं भारतीय संस्कृति की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।
अतीत और वर्तमान के बीच मजबूत हो सेतु
अनुग्रह कॉलेज के हिंदी विभाग के प्राध्यापक डॉ. उमाशंकर सिंह ने संस्कृत को अतीत और वर्तमान के बीच सेतु बताते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक संदर्भों से जोड़ना समय की आवश्यकता है। उन्होंने संस्कृत के ज्ञान को वर्तमान सामाजिक एवं शैक्षणिक आवश्यकताओं से जोड़ने की बात कही।
डीपीएस, गयाजी के हिंदी के वरीय शिक्षक देवेंद्र कुमार पाठक ने पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़े आचार्यों को संस्कृत का महत्वपूर्ण संवाहक बताया। उन्होंने कहा कि धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से संस्कृत आज भी बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचती है। ऐसे में आचार्यों और पुरोहितों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
संस्कृत जीवन और जीविका दोनों का आधार बन सकती है : प्रो. रोशन मौर्य
दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के संस्कृत संकायाध्यक्ष प्रो. रोशन मौर्य ने संस्कृत को केवल धार्मिक अथवा साहित्यिक भाषा मानने की धारणा से आगे बढ़ने की आवश्यकता बताई। उन्होंने संस्कृत को ‘इकोनॉमी और इकोलॉजी’ दोनों दृष्टियों से उपयोगी बताते हुए कहा कि संस्कृत जीवन और जीविका दोनों का आधार बन सकती है।
उन्होंने संस्कृत से जुड़े रोजगार, शोध, अनुवाद, शिक्षा, पर्यटन, भारतीय ज्ञान परंपरा और अन्य आधुनिक क्षेत्रों की संभावनाओं की ओर ध्यान आकर्षित किया।
संस्कृत विद्वानों तक सीमित नहीं, समाज के हर वर्ग की भाषा रही : डॉ. सच्चिदानन्द प्रेमी
कार्यक्रम के संयोजक डॉ. सच्चिदानन्द प्रेमी ने संस्कृत के ऐतिहासिक सामाजिक स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए राजा भोज के काल का स्मरण किया। उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल विद्वानों या किसी विशेष वर्ग तक सीमित भाषा नहीं रही, बल्कि भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों में इसका व्यापक प्रभाव रहा है।
उन्होंने कहा कि संस्कृत का साहित्य अत्यंत विशाल है और उसका व्याकरण इसकी सीमा नहीं, बल्कि इसकी शक्ति है। व्याकरण की वैज्ञानिक संरचना ने संस्कृत को अधिक व्यवस्थित, समृद्ध और अभिव्यक्ति की दृष्टि से सक्षम बनाया है।
डॉ. प्रेमी ने संस्कृत को जनमानस से जोड़ने के लिए केवल सरकारी अथवा संस्थागत प्रयासों पर निर्भर रहने के बजाय सामाजिक भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया।
संस्कृत आज भी जन-जन के मन में रची-बसी : आचार्य सत्यशेखर राय
अपने अध्यक्षीय संबोधन में आचार्य सत्यशेखर राय ने संस्कृत की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि अनेक बाधाओं के बावजूद संस्कृत आज भी भारतीय जनमानस में रची-बसी है। उन्होंने कहा कि आदिकाल से ही संस्कृत को मधुर, आकर्षक और प्रभावशाली भाषा के रूप में प्रतिष्ठा मिली और आज भी इसकी उपयोगिता समाप्त नहीं हुई है।
उन्होंने कहा कि संस्कृत को लेकर समाज में सकारात्मक वातावरण तैयार करने की जरूरत है। इसके लिए विद्यालयों, परिवारों, धार्मिक संस्थानों और सामाजिक संगठनों को मिलकर प्रयास करना होगा।
संस्कृत से संस्कार और संस्कार से सशक्त समाज का निर्माण
समापन समारोह का मूल संदेश यही रहा कि संस्कृत का पुनरुत्थान केवल भाषा के संरक्षण का प्रश्न नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान, संस्कृति और संस्कार परंपरा को मजबूत करने का अभियान है। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि संस्कृत को केवल पाठ्यक्रम अथवा धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित रखने के बजाय दैनिक जीवन, पारिवारिक संवाद, साहित्य, शिक्षा, तकनीक और रोजगार के नए क्षेत्रों से जोड़ना होगा।
ग्यारह दिवसीय ‘संस्कृत एकादशी’ ने इस दृष्टि से संस्कृत के प्रति समाज में नई चेतना पैदा करने का प्रयास किया। कार्यक्रम में उपस्थित विद्वानों ने इस अभियान को निरंतर आगे बढ़ाने और संस्कृत को जनमानस की सहज भाषा बनाने का संकल्प व्यक्त किया।
कार्यक्रम के अंत में जिला स्कूल के पूर्व प्राचार्य डॉ. सुदर्शन शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन किया। समारोह में विद्वानों, शिक्षाविदों, साहित्यकारों, शोधार्थियों, समाजसेवियों एवं संस्कृत प्रेमियों की उपस्थिति रही।
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