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“इतिहास में गांधी जी को श्रेय मिला, लेकिन मेरे परनाना राजकुमार शुक्ल को भुला दिया गया” -सुमित वत्स

“इतिहास में गांधी जी  को श्रेय मिला, लेकिन मेरे परनाना राजकुमार शुक्ल को भुला दिया गया” -सुमित वत्स

पटना। चंपारण सत्याग्रह के इतिहास में पंडित राजकुमार शुक्ल की भूमिका को उचित सम्मान और स्थान दिए जाने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। पंडित राजकुमार शुक्ल के परनाती एवं उनके स्मारक न्यास के महासचिव सुमित वत्स ने कहा कि इतिहास में महात्मा गांधी को चंपारण सत्याग्रह का व्यापक श्रेय मिला, लेकिन जिस किसान नेता ने गांधीजी को चंपारण आने के लिए लगातार प्रेरित किया, उनके परनाना राजकुमार शुक्ल को अपेक्षित रूप से याद नहीं किया गया।

सुमित वत्स का कहना है कि “इतिहास में गांधी को श्रेय मिला, लेकिन मेरे परनाना राजकुमार शुक्ल को भुला दिया गया।” उनके अनुसार यह केवल उनके परिवार की पीड़ा नहीं, बल्कि इतिहास के उस हिस्से को सामने लाने का सवाल है, जिसमें स्थानीय किसानों और उनके संघर्ष की भूमिका को पर्याप्त जगह नहीं मिली।

राजकुमार शुक्ल ने चंपारण के किसानों पर नीलहों के अत्याचार और शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई थी। उन्होंने महात्मा गांधी से लगातार आग्रह किया कि वे चंपारण आएं और किसानों की स्थिति को स्वयं देखें। अंततः गांधीजी 1917 में चंपारण पहुंचे और वहां सत्याग्रह का ऐतिहासिक आंदोलन प्रारंभ हुआ।

हालांकि, इतिहास की लोकप्रिय कथा में चंपारण सत्याग्रह का केंद्र प्रायः गांधीजी को बनाया गया, जबकि गांधीजी को चंपारण तक लाने वाले राजकुमार शुक्ल की भूमिका अपेक्षाकृत पीछे चली गई। हाल की एक विस्तृत समीक्षा में भी यह सवाल उठाया गया है कि क्या राजकुमार शुक्ल की पहचान केवल “गांधी को चंपारण लाने वाले व्यक्ति” तक सीमित कर देना उनके व्यापक संघर्ष के साथ न्याय है।

राजकुमार शुक्ल की भूमिका पर चर्चा करते हुए यह भी सामने आया है कि गांधी के चंपारण पहुंचने से पहले ही स्थानीय स्तर पर किसानों की पीड़ा और नीलहों के अत्याचार के खिलाफ संघर्ष चल रहा था। राजकुमार शुक्ल उसी संघर्ष की प्रमुख आवाज थे। यही कारण है कि इतिहासकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर से अब उनके योगदान पर नए सिरे से शोध और दस्तावेजीकरण की मांग उठ रही है।

दिसंबर 2025 में राजकुमार शुक्ल की 150वीं जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में भी वक्ताओं ने गांधीजी के सहयोगियों पर शोध की आवश्यकता बताई थी। उस कार्यक्रम में सुमित कुमार वत्स ने धन्यवाद ज्ञापन किया था और उन्हें राजकुमार शुक्ल का परनाती तथा स्मारक न्यास का महासचिव बताया गया था।

वहीं अगस्त 2026 में उनकी 151वीं जयंती के अवसर पर राजकुमार शुक्ल की स्मृति को पुनः स्थापित करने की बहस और तेज हुई। इस अवसर पर यह विचार प्रमुखता से सामने आया कि चंपारण सत्याग्रह को गांधीजी के योगदान से अलग नहीं किया जा सकता, लेकिन राजकुमार शुक्ल के योगदान को भी गांधी की विराट छवि के पीछे दबाया नहीं जाना चाहिए।

राजकुमार शुक्ल की स्मृति को लेकर अब केवल प्रतिमा या जयंती समारोह तक सीमित रहने के बजाय उनके जीवन, किसान संघर्ष, दस्तावेजों और परिवार की स्मृतियों को संरक्षित करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। यही प्रयास उस ऐतिहासिक संतुलन को स्थापित कर सकता है, जिसमें गांधी के साथ-साथ उस किसान नेता को भी उचित स्थान मिले, जिसने चंपारण की पीड़ा को राष्ट्रीय नेतृत्व तक पहुंचाने का साहस किया था।सुमित वत्स का यह कथन इसी ऐतिहासिक विस्मृति के विरुद्ध एक परिवारजन की पीड़ा ही नहीं, बल्कि इतिहास को नए सिरे से देखने की मांग भी है।
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