पर-स्त्री को बहन समझने का संकल्प हो, इस रक्षाबंधन पर
कुमार महेंद्ररक्षा का धागा केवल,
कलाई तक सीमित न हो।
सावन की इस मंगल बेला,
मन भी निर्मल-पावन हो।
दृष्टि-दृष्टि में प्रेम सुमन खिलें,
विषम विचारों के खंडन पर।
पर-स्त्री को बहन समझने का संकल्प हो,
इस रक्षाबंधन पर।।
राह हो चाहे सड़क-चौराहा,
नारी निर्भय आती-जाती रहे।
रूप-रंग से परे उसे ,
हर दृष्टि सम्मान देती रहे।
मन की कालिख दूर हो जाए,
सात्त्विक भावों के मंथन पर।
पर-स्त्री को बहन समझने का संकल्प हो,
राह हो चाहे सड़क-चौराहा,
नारी निर्भय आती-जाती रहे।
रूप-रंग से परे उसे ,
हर दृष्टि सम्मान देती रहे।
मन की कालिख दूर हो जाए,
सात्त्विक भावों के मंथन पर।
पर-स्त्री को बहन समझने का संकल्प हो,
इस रक्षाबंधन पर।।
जिस नारी ने जग को सींचा,
जिसने जीवन-दीप जलाए।
ऐसे सजग प्रयास हम करें,
उसकी गरिमा पर आँच न आए।
किसी नारी की लाज पुकारे,
तो हम खड़े रहें संरक्षण पर।
पर-स्त्री को बहन समझने का संकल्प हो,
जिस नारी ने जग को सींचा,
जिसने जीवन-दीप जलाए।
ऐसे सजग प्रयास हम करें,
उसकी गरिमा पर आँच न आए।
किसी नारी की लाज पुकारे,
तो हम खड़े रहें संरक्षण पर।
पर-स्त्री को बहन समझने का संकल्प हो,
इस रक्षाबंधन पर।।
रिश्ते केवल रक्त से बनते,
ऐसा बंधन नहीं जरूरी।
मानवता के पावन धागे,
मिटा दें हर मन की दूरी।
हर बेटी को मिले खुला आकाश,
नव-उड़ानों के स्पंदन पर।
पर-स्त्री को बहन समझने का संकल्प हो,
रिश्ते केवल रक्त से बनते,
ऐसा बंधन नहीं जरूरी।
मानवता के पावन धागे,
मिटा दें हर मन की दूरी।
हर बेटी को मिले खुला आकाश,
नव-उड़ानों के स्पंदन पर।
पर-स्त्री को बहन समझने का संकल्प हो,
इस रक्षाबंधन पर।।
बदले सोच तो बदले दुनिया,
बदले जीवन की परिभाषा।
सोशल मीडिया पर भी अब,
शालीन रहे हर एक भाषा।
कुंठा, कुविचार स्वयं मिट जाएँ,
सुसंस्कारों के मंडन पर।
पर-स्त्री को बहन समझने का संकल्प हो,
बदले सोच तो बदले दुनिया,
बदले जीवन की परिभाषा।
सोशल मीडिया पर भी अब,
शालीन रहे हर एक भाषा।
कुंठा, कुविचार स्वयं मिट जाएँ,
सुसंस्कारों के मंडन पर।
पर-स्त्री को बहन समझने का संकल्प हो,
इस रक्षाबंधन पर।।
सच्चा पर्व तभी कहलाए,
जब भयमुक्त संसार बने।
हर बेटी निर्भीक चले और,
हर पथ उसका साकार बने।
रक्षा-सूत्र पर्व सदा सार्थक,
नारी-शक्ति के वंदन पर।
पर-स्त्री को बहन समझने का संकल्प हो,
सच्चा पर्व तभी कहलाए,
जब भयमुक्त संसार बने।
हर बेटी निर्भीक चले और,
हर पथ उसका साकार बने।
रक्षा-सूत्र पर्व सदा सार्थक,
नारी-शक्ति के वंदन पर।
पर-स्त्री को बहन समझने का संकल्प हो,
इस रक्षाबंधन पर।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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