अर्धांगिनी बिना...
रचना डॉ अनमोल कुमार
सुबह चाय तो है, पर मिठास नहीं,
रसोई तो है, पर सुगंध नहीं।
घर तो वही है, दीवारें वही,
पर घर जैसा एहसास नहीं।
बटन टूटा कुर्ते का, तो टूटा ही रहा,
समय पर खाना, अब खाया नहीं।
बच्चे पूछें - माँ कब आएगी?
और मेरे पास कोई जवाब नहीं।
सच तो ये है -
घर मकान से नहीं बनता,
अर्धांगिनी बिना घर,
घर नहीं बनता।
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