हिटलर भी नतमस्तक हुआ, मेजर ध्यानचंद के सामने
कुमार महेंद्रबर्लिन के उस क्रीड़ा-रण में,
अद्भुत एक विधान हुआ।
भारत-माटी के गौरव का,
विश्व-पटल पर गान हुआ।
एक तरफ था दंभ खड़ा जो,
आतुर था कौशल को निहारने।
हिटलर भी नतमस्तक हुआ, मेजर ध्यानचंद के सामने।।
हॉकी की वह काठ नहीं थी,
भारत का अभिमान थी।
गेंद नहीं, वह भारत-माता के,
यश-गौरव की पहचान थी।
रुनझुन-रुनझुन चली जादुई छड़ी,
लगी इतिहास के पन्ने संवारने।
हिटलर भी नतमस्तक हुआ, मेजर ध्यानचंद के सामने।।
मखमली घासों पर उस दिन,
थिरका ऐसा खेल अनुपम।
जादुई कौशल देखकर तो,
ढीला पड़ा विपक्ष का दमखम।
भारत की जय-गाथा गूँजी,
टूटे दंभ, लगे शीश झुकने।
हिटलर भी नतमस्तक हुआ, मेजर ध्यानचंद के सामने।।
जिस सत्ता का दर्प अडिग था,
जिसका गर्व अपार हुआ।
भारत के इस क्रीड़ा-ऋषि से,
उसका दंभ तार-तार हुआ।
स्वर्णिम यश, सम्मान स्वयं ही,
लगे चरण श्रद्धा से पखारने।
हिटलर भी नतमस्तक हुआ, मेजर ध्यानचंद के सामने।।
अंकित है इतिहास-पटल पर,
वह गाथा अमर सुहानी।
वह क्षण केवल खेल नहीं था,
था भारत की गौरव-वाणी।
आज भी जिसकी कीर्ति देखकर,
विश्व आतुर है कौशल को अपनाने।
हिटलर भी नतमस्तक हुआ, मेजर ध्यानचंद के सामने।।
ध्यानचंद केवल नाम नहीं,
भारत का सम्मान रहे।
हॉकी की हर धड़कन में अब,
उनके कौशल का मान रहे।
आओ राष्ट्रीय खेल दिवस पर,
कदम बढ़ाएँ तिरंगी शान निखारने।
हिटलर भी नतमस्तक हुआ, मेजर ध्यानचंद के सामने।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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