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दिगपहंडी में गूंजा हिंदू राष्ट्र का संकल्प, सनातन संस्कृति के संरक्षण के लिए गांव-गांव अभियान का आह्वान

दिगपहंडी में गूंजा हिंदू राष्ट्र का संकल्प, सनातन संस्कृति के संरक्षण के लिए गांव-गांव अभियान का आह्वान

  • दंडी स्वामी लक्ष्मी बाबा के सानिध्य में संपन्न हुई हिंदू राष्ट्र संगोष्ठी, अधिवक्ता प्रेमचंद्र झा ने सेवा, सत्संग, स्वाध्याय और संकीर्तन से समाज को जोड़ने का किया आग्रह

दिगपहंडी, गंजाम (उड़ीसा)।
सनातन संस्कृति, भारतीय परंपरा एवं आध्यात्मिक चेतना को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से दिगपहंडी, जिला गंजाम, उड़ीसा में दंडी स्वामी लक्ष्मी बाबा के सानिध्य में हिंदू राष्ट्र संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं एवं सनातन धर्मावलंबियों ने भाग लिया और भारत की प्राचीन आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण तथा भावी पीढ़ी को सनातन मूल्यों से जोड़ने पर गंभीर विचार-विमर्श किया।

कार्यक्रम में पूज्यपाद जगद्गुरु शंकराचार्य गोवर्धन पीठाधीश्वर महाराज जी के शिष्य एवं ब्राह्मण भूषण अधिवक्ता प्रेमचंद्र झा ने अपने संबोधन में कहा कि भव्य, सशक्त और संस्कारवान भारत के निर्माण के लिए समाज के प्रत्येक वर्ग को सेवा, सत्संग, स्वाध्याय एवं विचार-विमर्श के माध्यम से जोड़ने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि केवल राजनीतिक या सामाजिक स्तर पर परिवर्तन की अपेक्षा करने से राष्ट्र का पुनर्निर्माण संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए व्यक्ति, परिवार और समाज के स्तर पर संस्कार एवं चेतना का निर्माण आवश्यक है।

अधिवक्ता प्रेमचंद्र झा ने कहा कि भारत की आत्मा उसकी सनातन संस्कृति में निहित है। भारतीय जीवन-पद्धति में धर्म का अर्थ केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि सत्य, न्याय, कर्तव्य, सेवा, संयम, करुणा और सर्वहित की भावना से है। उन्होंने कहा कि धर्म नियंत्रित, पक्षपात-विहीन, शोषण-विरोधी तथा सर्वहितकारी शासन व्यवस्था की स्थापना के लिए समाज में व्यापक वैचारिक जागरण आवश्यक है। उनके अनुसार, हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को वे भारतीय सनातन परंपरा, सांस्कृतिक मूल्यों और सर्वहित की भावना से जोड़कर देखते हैं।

उन्होंने कहा कि भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित कराने के उद्देश्य से व्यापक जनजागरण की आवश्यकता है और इसके लिए समाज के लोगों को संगठित होकर शांतिपूर्ण एवं लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि इसके बाद शासन-व्यवस्था में भारतीय एवं सनातन जीवन-मूल्यों को उचित स्थान मिलना चाहिए, ताकि भारतीय परंपरा, संस्कृति और जीवन-दर्शन का संरक्षण हो सके।

श्री झा ने विशेष रूप से बच्चों और माताओं को सनातन संस्कारों से जोड़ने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी सभ्यता की वास्तविक शक्ति उसकी अगली पीढ़ी में होती है। यदि बच्चों को बचपन से ही अपने धर्म, संस्कृति, संस्कार, महापुरुषों, शास्त्रों और भारतीय परंपराओं की जानकारी दी जाए तो आने वाली पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहेगी। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म के सिद्धांतों और भारतीय संस्कृति का प्रचार गांव-गांव तक होना चाहिए और इसमें महिलाओं तथा मातृशक्ति की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे-छोटे समूह बनाकर नियमित रूप से संकीर्तन एवं धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि गांवों में टोली बनाकर सामूहिक संकीर्तन किया जाए और प्रत्येक व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में कम से कम सवा घंटे भगवान के भजन, ध्यान, स्वाध्याय अथवा आध्यात्मिक साधना के लिए निकाले। इससे व्यक्ति के भीतर आत्मिक शांति के साथ-साथ सामाजिक एकता और पारस्परिक सद्भाव की भावना भी मजबूत होगी।

उन्होंने कहा कि सनातन समाज को केवल पर्व-त्योहारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि दैनिक जीवन में धर्म और संस्कारों को उतारना चाहिए। परिवार में नियमित पूजा, बच्चों को धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा, संतों के विचारों का श्रवण, सामूहिक भजन-कीर्तन तथा समाजसेवा जैसे कार्यों को जीवन का हिस्सा बनाने की आवश्यकता है।

संगोष्ठी में उपस्थित श्रद्धालुओं ने हिंदू राष्ट्र के उद्देश्य तथा सनातन संस्कृति के संरक्षण के लिए अपने स्तर से सहयोग करने का आश्वासन दिया। उपस्थित लोगों ने गांव-गांव तक जनजागरण अभियान को पहुंचाने, अधिक से अधिक लोगों को सत्संग एवं संकीर्तन से जोड़ने तथा बच्चों एवं युवाओं में भारतीय संस्कृति के प्रति गौरव की भावना विकसित करने की आवश्यकता पर सहमति व्यक्त की।

कार्यक्रम के दौरान पूज्य दंडी स्वामी लक्ष्मी बाबा ने आदिवासी क्षेत्रों एवं ग्रामीण अंचलों में हिंदू राष्ट्र एवं सनातन संस्कृति के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए चलाए जा रहे अभियानों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचकर उसे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना आवश्यक है। उन्होंने ग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्रों में सेवा, संस्कार, सत्संग और आध्यात्मिक जागरण के माध्यम से सामाजिक चेतना विकसित करने पर जोर दिया।

संगोष्ठी में उपस्थित अन्य वक्ताओं एवं भक्तों ने भी सनातन संस्कृति, सामाजिक एकता, धार्मिक जागरण, सेवा कार्य तथा राष्ट्र निर्माण से जुड़े विषयों पर अपने विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान समय में युवा पीढ़ी को भारतीय इतिहास, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा से परिचित कराना विशेष रूप से आवश्यक है। इसके लिए धार्मिक आयोजनों के साथ-साथ अध्ययन, संवाद और सामाजिक सेवा के कार्यक्रम भी आयोजित किए जाने चाहिए।

कार्यक्रम को सफल बनाने में श्री पूर्णेन्दु मिश्रा, प्रमोद कुमार पांडा, दैनिक समाचार उड़िया के संस्थापक प्रदीप कुमार नाहक, निर्देशक अश्विनी कुमार पटनायक, गीतांजलि पांडा, शिव प्रसाद रथ, रोशनी साहू, ब्रह्मचारी अंतरजमी स्वरूप, पंडित संभव प्रसाद त्रिपाठी, देवाशीष जाना, गीतांजलि पात्र, शिवनारायण पात्र, सुजाता प्रधान सहित अनेक कार्यकर्ताओं एवं श्रद्धालुओं की सक्रिय भूमिका रही।

संगोष्ठी का समापन सनातन संस्कृति के संरक्षण, समाज में सेवा एवं आध्यात्मिक चेतना के विस्तार तथा राष्ट्रहित में सक्रिय भूमिका निभाने के संकल्प के साथ हुआ। कार्यक्रम में श्रद्धालुओं के बीच आध्यात्मिक उत्साह और सामाजिक जागरण की भावना स्पष्ट दिखाई दी।

हर हर महादेव।
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