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"संतोष : समृद्धि का मौन रहस्य"

"संतोष : समृद्धि का मौन रहस्य"

पंकज शर्मा

मित्रों मनुष्य प्रायः यह मानकर चलता है कि अगली उपलब्धि, अधिक संपन्नता या कोई नई प्राप्ति उसके भीतर के अभाव को भर देगी। किंतु तृष्णा की प्रकृति ऐसी है कि एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी जन्म ले लेती है। यदि वर्तमान की प्राप्ति में आनंद नहीं है, तो भविष्य की उपलब्धि भी मन को स्थायी शांति नहीं दे सकती। असंतोष वस्तुओं की कमी नहीं, दृष्टि की अतृप्ति है।

सच्ची समृद्धि संग्रह में नहीं, प्राप्त के प्रति कृतज्ञ होने की क्षमता में निहित है। इसका अर्थ आकांक्षाओं का त्याग नहीं, बल्कि उन्हें अपने संतोष का स्वामी न बनने देना है। जो आज के छोटे सुखों को पहचानना सीख जाता है, वह भविष्य की बड़ी उपलब्धियों का भी अधिक सजगता से स्वागत करता है। अंततः जीवन की पूर्णता इस बात में नहीं कि हमारे पास कितना है, बल्कि इसमें है कि जो है, उसके साथ हमारा अंतर्मन कितना शांत है।

. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार)
पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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