समानता का अधिकार
अरुण दिव्यांशजैसे चार दिनों का शीत बयार ,
जैसे अनुनासिक मात्रा अनुस्वार ।
पुरुष सा सहभागिता तो कर ले ,
फिर महिला समानता अधिकार ।।
बातों का हल तो सबको है आता ,
खेतों में चला ले कुदाल और हल ।
माना महिला है लक्ष्मी सरस्वती ,
किंतु पुरुष देख नारी जाती है जल ।।
कहे महिला मत हिला तू मुझको ,
नारी कहाॅं मानने ही वाली हार है ।
घर भर को है इशारे पे नचाती ,
बिन तलवार नारी उल्टी धार है ।।
पति होता जिसके पूरे कब्जे में ,
सास ससुर का नित्य हो अपमान ।
ससुराल को हर पल नीच दिखाना ,
जिसमें समझती अपना सम्मान ।।
महिला होतीं लक्ष्मी सरस्वती ,
किंतु न लक्ष्मी सरस्वती द्वार हैं ।
हर पल दिखे लाल लाल ऑंखें ,
जैसे लगतीं माॅं काली के अवतार हैं ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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