हरिद्वार : जहाँ हर डुबकी में मोक्ष और हर कण में शिव
सत्येंद्र कुमार पाठक
29 अगस्त 2026 का दिन मेरे जीवन का सबसे पावन दिन बन गया। आज सुबह ब्रह्म मुहूर्त में जब मैंने हरिद्वार की माँ गंगा में पहली डुबकी लगाई, तो शरीर तो ठंडे जल से सिहर उठा, पर आत्मा को जो शांति मिली उसे शब्दों में कहना असंभव है। ऐसा लगा जैसे गंगा मैया ने अपने आँचल में सारे पाप, सारी थकान धो दी हो। किनारे पर बैठकर जब अंजुली में गंगा जल लेकर घाट पर स्थित शिवलिंग और नंदी महाराज का अभिषेक किया, तो लगा बाबा भोलेनाथ स्वयं प्रसन्न होकर आशीर्वाद दे रहे हैं। हरिद्वार में गंगा एक नदी नहीं, एक माला है और उसके घाट उसके मोती हैं। हर घाट की अपनी कहानी, अपना महत्व है।
. हर की पौड़ी - ब्रह्मांड का केंद्र है । यह हरिद्वार का सबसे पवित्र और मुख्य घाट है। कहते हैं यहाँ भगवान विष्णु के चरण पड़े थे, इसलिए नाम हर की पौड़ी। यहीं पर समुद्र मंथन का अमृत गिरा था। सुबह 4 बजे से ही यहाँ "हर हर गंगे" की गूंज शुरू हो जाती है। पत्थर की सीढ़ियों पर बैठकर जब तेज बहती गंगा को देखते हैं, तो लगता है जैसे स्वर्ग यहीं उतर आया हो। शाम की आरती के समय हजारों दीये जब गंगा में तैरते हैं, तो आँखें भर आती हैं। यहीं मैंने डुबकी लगाई।
कुशावर्त घाट - पितरों का घाट - हर की पौड़ी से थोड़ा आगे यह घाट है। यहाँ का जल बहुत शांत और गहरा है। यहाँ पितरों के लिए पिंडदान और तर्पण किया जाता है। मान्यता है कि यहाँ दत्तात्रेय जी ने तपस्या की थी। यहाँ का वातावरण बहुत गंभीर और शांतिपूर्ण है।
कनखल घाट - जहाँ सती ने प्राण दिए - यह घाट थोड़ा अलग है। यहाँ गंगा के किनारे दक्ष महादेव मंदिर है। यहीं घाट पर वह यज्ञ कुंड आज भी है जहाँ माता सती ने खुद को भस्म किया था। यहाँ के शिवलिंग पर गंगा जल चढ़ाने से वैवाहिक जीवन सुखी होता है, ऐसी मान्यता है। मैंने भी यहाँ नंदी की कान में अपनी मनोकामना कही और अंजुली से जल चढ़ाया।
. गौ घाट और विष्णु घाट - स्नान के घाट - ये घाट स्थानीय लोगों के प्रिय हैं। यहाँ भीड़ कम होती है। गौ घाट पर गायों को स्नान कराकर पुण्य कमाया जाता है। विष्णु घाट पर भगवान विष्णु का प्राचीन मंदिर है। यहाँ का सूर्योदय देखना अद्भुत है।
सप्तऋषि घाट / सप्त सरोवर घाट - सात धाराओं का घाट*
यह मेरे लिए सबसे आश्चर्यजनक था। यहाँ गंगा एक नहीं, सात धाराओं में बंट जाती है। कहते हैं सप्त ऋषियों की तपस्या में बाधा न हो, इसलिए गंगा ने खुद को सात भागों में बाँट लिया। यहाँ का पानी एकदम क्रिस्टल जैसा साफ है। किनारे पर ऋषियों के छोटे-छोटे मंदिर हैं। यहाँ बैठकर ध्यान करने से मन तुरंत शांत हो जाता है।
बिरला घाट और मालवीय घाट - शांत घाट - ये घाट सफाई और शांति के लिए प्रसिद्ध हैं। बिरला घाट का निर्माण बिरला परिवार ने करवाया था। यहाँ संगमरमर की सीढ़ियाँ हैं। मालवीय घाट पंडित मदन मोहन मालवीय जी के नाम पर है। यहाँ बैठकर घंटों गंगा को निहारा जा सकता है। कोई शोर नहीं, सिर्फ पानी की कल-कल।
घाट सिर्फ पत्थर की सीढ़ियाँ नहीं हैं। ये हमारे जीवन के पड़ाव हैं। किसी घाट पर पाप धुलते हैं, किसी पर पितर तृप्त होते हैं, किसी पर ज्ञान मिलता है। जब आप अंजुली में गंगा जल लेकर "ॐ नमः शिवाय" बोलते हुए शिवलिंग पर चढ़ाते हैं, तो हाथ से जल नहीं, आपका अहंकार बहता है।
हरिद्वार आकर समझ आया - गंगा में डुबकी लगाना शरीर को धोना नहीं, आत्मा को जगाना है।
हरिद्वार के तीन दिव्य घाट - जहाँ इतिहास, आस्था और मोक्ष मिलते हैं । हरिद्वार में 30 से अधिक घाट हैं, पर तीन घाटों का अपना अलग इतिहास और आध्यात्मिक चमत्कार है। 29 अगस्त को मैंने भी इन्हीं घाटों पर स्नान और दर्शन किया।
. हर की पौड़ी - ब्रह्मकुंड, मोक्ष का द्वार को हरिद्वार का दिल और ब्रह्मकुंड भी कहते हैं।
हर की पौरी का निर्माण राजा विक्रमादित्य ने अपने भाई भर्तृहरि की याद में करवाया था, जो यहाँ गंगा किनारे तपस्या करते थे। बाद में 1938 में और फिर 1986 में इसका विस्तार हुआ।"हर की पौड़ी" का अर्थ है - हरि यानी भगवान विष्णु के चरण। यहाँ एक शिला पर विष्णु जी के पदचिह्न आज भी हैं। मान्यता है कि यहीं से गंगा पहाड़ों को छोड़कर मैदान में प्रवेश करती है। समुद्र मंथन के समय जब विश्वकर्मा जी अमृत कलश ले जा रहे थे, तो अमृत की बूंदें हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन, नासिक में गिरीं - हर की पौड़ी उनमें से एक है। यहाँ स्नान से मोक्ष मिलता है। शाम को सूर्यास्त के समय जब पुजारी बड़े-बड़े दीयों से आरती करते हैं, घंटियाँ बजती हैं और हजारों दीये गंगा में तैरते हैं, तो पूरा पानी सोने जैसा चमकता है। वही दृश्य सबसे दिव्य होता है। यहाँ हर दिन हजारों लोग डुबकी लगाते हैं। 8f4d
. महाराजा अग्रसेन घाट - सेवा और शांति का घाट है। ओहर की पौड़ी की भीड़ से थोड़ा हटकर, भूपतवाला क्षेत्र में स्थित यह घाट नया और बहुत शांत है। यह घाट अग्रवाल समाज के कुलदेवता महाराजा अग्रसेन जी को समर्पित है। इसका निर्माण महाराजा अग्रसेन धर्मशाला ट्रस्ट ने करवाया है। इसलिए यहाँ सफाई, व्यवस्था और शांति बहुत है। यह घाट उन लोगों के लिए है जो शोर से दूर, एकांत में गंगा स्नान करना चाहते हैं। यहाँ सीढ़ियाँ चौड़ी और साफ हैं, सुबह की ठंडी हवा में यहाँ टहलना और ध्यान करना बहुत सुकून देता है। भूपतवाला रोड से यह घाट आसानी से पहुँचा जा सकता है। यहाँ कोई धक्का-मुक्की नहीं, आप अंजुली में जल लेकर आराम से शिवलिंग का अभिषेक कर सकते हैं, जैसे मैंने किया। अग्रसेन महाराज ने "एक ईंट, एक रुपया" का सिद्धांत दिया था, वही सेवा भाव इस घाट पर दिखता है - यहाँ गरीबों के लिए मुफ्त भोजन और ठहरने की व्यवस्था भी है।
. हंस घाट (बिरला घाट के पास) - ज्ञान और योग का घाट है। हंस घाट को कुछ लोग मालवीय घाट के नाम से भी जानते हैं। इसका नाम महामना मदन मोहन मालवीय जी के नाम पर पड़ा है।
यहाँ भगवान ब्रह्मा के वाहन हंस ने तपस्या की थी, इसलिए नाम हंस घाट। यहाँ गंगा का बहाव सबसे कम तेज है, पानी स्थिर और नीला है। इसलिए पुराने समय में ऋषि यहाँ वेदों का पाठ करते थे।
इस घाट पर जीवन रक्षक टावर और पक्के चेंजिंग रूम हैं। यहाँ के पास ही बिरला टॉवर (1936 में बना) और मालवीय द्वीप है। यहाँ का वातावरण विद्यार्थियों और योग करने वालों को बहुत पसंद आता है। शाम को यहाँ भी छोटी आरती होती है, पर भीड़ नहीं होती। हर की पौड़ी - आस्था का घाट - जहाँ मोक्ष मिलता है। अग्रसेन घाट - सेवा का घाट - जहाँ शांति मिलती है। हंस घाट - ज्ञान का घाट - जहाँ ध्यान लगता है। तीनों घाटों पर गंगा एक ही है, पर अनुभव तीन तरह का। एक बार हरिद्वार आएं तो तीनों घाटों पर जरूर स्नान करें - भीड़ में भक्ति, एकांत में शांति और शांत जल में आत्मचिंतन - तीनों का संगम ही हरिद्वार है।
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