शब्दों में बसकर अमर होने की साधना : ‘एक शाम साहित्य के नाम’ में डॉ. विकास शुक्ला से सार्थक संवाद
- कविता केवल भावों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना, सकारात्मकता और नैतिक मूल्यों के जागरण का सशक्त माध्यम : डॉ. विकास शुक्ला


गया। साहित्य मनुष्य के भीतर छिपी संवेदनाओं को शब्द देता है और शब्द जब सृजन की शक्ति से जुड़ते हैं तो वे समय की सीमाओं को पार कर अमर हो जाते हैं। इसी साहित्यिक चेतना और संवाद की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए राष्ट्रीय साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था ‘शब्दवीणा’ की हरियाणा प्रदेश समिति एवं फरीदाबाद जिला समिति द्वारा आयोजित मासिक साहित्यिक भेंटवार्ता ‘एक शाम साहित्य के नाम’ के अगस्त अंक का गरिमामय आयोजन हुआ। कार्यक्रम में आमंत्रित साहित्यकार के रूप में कवि, साहित्यकार एवं शब्दवीणा फरीदाबाद जिला समिति के कोषाध्यक्ष डॉ. विकास शुक्ला उपस्थित रहे। लगभग एक घंटे तक चले इस आत्मीय संवाद में जीवन, समाज, संस्कृति, मानवीय संवेदना और साहित्य के विविध आयामों पर गंभीर, रोचक एवं सारगर्भित चर्चा हुई।
कार्यक्रम का संचालन शब्दवीणा की हरियाणा प्रदेश सचिव, वरिष्ठ कवयित्री एवं कार्यक्रम की संयोजिका श्रीमती सरोज कुमार ने किया। शब्दवीणा की राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. डॉ. रश्मि प्रियदर्शनी एवं श्रीमती सरोज कुमार ने डॉ. विकास शुक्ला का साहित्यिक मंच पर हार्दिक अभिनंदन किया।
साहित्य से जीवन तक की यात्रा
वार्ता का आरंभ डॉ. विकास शुक्ला के साहित्यिक एवं पारिवारिक परिचय से हुआ। श्रीमती सरोज कुमार ने उनके जीवन, पारिवारिक पृष्ठभूमि तथा साहित्यिक यात्रा से जुड़े प्रश्नों के माध्यम से संवाद को सहज और आत्मीय बनाया।
डॉ. विकास शुक्ला जापानी बहुराष्ट्रीय कंपनी सोज़ीत्ज़ में वरिष्ठ प्रबंधकीय दायित्वों का निर्वहन करते हुए वर्ष 2002 से निरंतर साहित्य-साधना में संलग्न हैं। व्यावसायिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच साहित्य के लिए समय निकालना उनके भीतर के रचनाकार की जीवंतता को दर्शाता है। उन्होंने अपने अनुभवों को शब्दों में ढालते हुए साहित्य को जीवन की अनुभूतियों से जोड़ने का प्रयास किया है।
प्रयागराज के संदर्भ में पूछे गए प्रश्न पर डॉ. शुक्ला ने इस शहर की सहजता, सरलता और साहित्यिक वातावरण की विशेष प्रशंसा की। उन्होंने प्रयागराज को साहित्यिक सृजन के लिए अत्यंत सुंदर और प्रेरणादायी स्थान बताया।
फूल और पत्थर के बहाने संवेदनाओं की बात
वार्ता के दौरान साहित्य में कोमलता और कठोरता के प्रतीकों पर भी रोचक चर्चा हुई। डॉ. शुक्ला के फूल एवं पत्थर संबंधी विचारों के संदर्भ में श्रीमती सरोज कुमार ने अपनी पंक्तियों—
“पत्थरों से खेलने का शौक ओ मेरे सनम, हमने नहीं पाला।
फूल ही फेंकेंगे सदा यदि कभी अपना गुस्सा तुम पर निकाला।”
-का अत्यंत प्रभावशाली अंदाज में पाठ किया।
इन पंक्तियों ने संवाद को एक अलग भावभूमि प्रदान की। प्रेम, संवेदना और मानवीय संबंधों की कोमलता को शब्दों के माध्यम से व्यक्त करते हुए यह संदेश भी उभरकर सामने आया कि साहित्य मनुष्य को कठोर परिस्थितियों में भी संवेदनशील बने रहने की प्रेरणा देता है।
कविता : जीवन के कटु-मधुर अनुभवों का दस्तावेज
डॉ. विकास शुक्ला ने कविता को केवल भावों की अभिव्यक्ति मानने के बजाय उसे मानवीय चेतना और संवेदनाओं को जगाने वाला माध्यम बताया। उनके अनुसार कविता मनुष्य के जीवन में सकारात्मकता का संचार करने के साथ-साथ नैतिक मूल्यों के प्रति जागरूकता पैदा करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
उन्होंने कहा कि जीवन में आने वाले कटु और मधुर दोनों प्रकार के अनुभव साहित्य को समृद्ध करते हैं। इन्हीं अनुभवों से कविता जन्म लेती है और पाठक के हृदय तक पहुंचकर उसे अपने साथ जोड़ती है।
अपने इसी विचार को उन्होंने अपनी चर्चित पंक्तियों के माध्यम से व्यक्त किया-
“सुना है शब्द हैं ब्रह्म, ये मरा नहीं करते,
मैं इन शब्दों में बस कर अमर हो जाऊँगा...”
इन पंक्तियों ने साहित्य और शब्द की शक्ति पर गंभीर विमर्श को जन्म दिया। वास्तव में रचनाकार के लिए शब्द केवल अभिव्यक्ति का साधन नहीं, बल्कि उसकी अनुभूतियों, विचारों और अस्तित्व को समय के पार पहुंचाने का माध्यम भी हैं।
प्रेम और विरह की भावभूमि में डूबी कविता
कार्यक्रम का सबसे भावपूर्ण पक्ष तब सामने आया जब डॉ. विकास शुक्ला ने अपनी भाव-सिंचित रचना की पंक्तियां प्रस्तुत कीं- ज़िंदगी हसीन होगी।
तुम्हारे बिना भी यह रंगीन होगी,
पर आलम यह है कि तुम्हारे बिना
ये ज़िंदगी बोझ लगती है।
कभी-कभी नहीं, हर रोज लगती है।
ये तो तुम्हारी यादें हैं, जिनके सहारे मैं ज़िंदा हूँ।
तुम बिन ज़िंदा हूँ, बस इसी बात पर शर्मिंदा हूँ।”
श्रृंगार और विरह के भावों से ओतप्रोत इन पंक्तियों ने कार्यक्रम को भावनात्मक ऊंचाई प्रदान की। डॉ. शुक्ला ने इन्हें जिस सहजता और आत्मीयता के साथ प्रस्तुत किया, उससे ऑनलाइन जुड़े साहित्यप्रेमी भी भाव-विभोर हुए।
यह कविता केवल प्रेम की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि स्मृति, विरह और जीवन के उस भावात्मक पक्ष को सामने लाती है, जिसमें किसी प्रिय की अनुपस्थिति भी उसकी स्मृतियों को और अधिक जीवंत बना देती है।
प्रश्नों में जीवन, उत्तरों में साहित्य
वार्ताकार श्रीमती सरोज कुमार ने मनुष्य, समाज, संस्कृति, भाव, विचार और साहित्य के अंतर्संबंधों को केंद्र में रखते हुए डॉ. शुक्ला से अनेक रोचक और विचारोत्तेजक प्रश्न किए। डॉ. शुक्ला ने प्रत्येक प्रश्न का शालीनता, सहजता और विद्वता के साथ उत्तर दिया।
पूरे संवाद में यह बात बार-बार उभरकर सामने आई कि साहित्य समाज से अलग कोई स्वतंत्र द्वीप नहीं है। साहित्यकार अपने आसपास के जीवन, लोगों के व्यवहार, सामाजिक परिस्थितियों, रिश्तों, संवेदनाओं और बदलते मूल्यों से प्रभावित होता है और फिर उन्हीं अनुभूतियों को अपनी रचनात्मक दृष्टि से शब्द देता है।
इस दृष्टि से ‘एक शाम साहित्य के नाम’ केवल एक साहित्यकार के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केंद्रित कार्यक्रम न रहकर साहित्य और जीवन के बीच संबंधों पर एक सार्थक विमर्श बन गया।
शब्दवीणा के साहित्यिक प्रयासों की सराहना
डॉ. विकास शुक्ला ने देश के विभिन्न प्रदेशों एवं जिलों में शब्दवीणा द्वारा संचालित साहित्यिक गतिविधियों की मुक्तकंठ से प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि साहित्यिक आयोजनों के माध्यम से साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों को एक साझा मंच उपलब्ध कराना वर्तमान समय में अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है।
उन्होंने शब्दवीणा को देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थाओं में से एक बताते हुए उसके निरंतर विस्तार और साहित्यिक गतिविधियों के लिए पूरे शब्दवीणा परिवार को हार्दिक शुभकामनाएं दीं।
देशभर से मिली प्रतिक्रियाओं ने बढ़ाई कार्यक्रम की गरिमा
लगभग एक घंटे तक चली इस साहित्यिक भेंटवार्ता का सीधा प्रसारण शब्दवीणा के केंद्रीय फेसबुक पेज के माध्यम से हुआ। देश के विभिन्न प्रदेशों से जुड़े साहित्यकारों, साहित्यप्रेमियों एवं साहित्यानुरागियों ने कार्यक्रम को देखा, सुना और अपनी प्रतिक्रियाओं के माध्यम से इसकी सराहना की।
कार्यक्रम से ऑनलाइन जुड़े सुधीर धोत्रे, अजय कुमार, डॉ. विजय शंकर, प्यारचंद कुमार मोहन, पुरुषोत्तम तिवारी, अरुण अपेक्षित, ललित शंकर, डॉ. रश्मि प्रियदर्शनी, सुम्मी नेथानी, डॉ. वीरेंद्र कुमार, प्रतीक प्रभाकर, प्रभु दयाल खट्टर, प्रीता पँवार कौशिक, मधु वशिष्ठ, सुरेश विद्यार्थी, प्रो. सुनील कुमार उपाध्याय तथा सुप्रिया आयुष सहित अनेक साहित्यप्रेमियों ने अपनी लिखित प्रतिक्रियाओं के माध्यम से कार्यक्रम के प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त कीं।
साहित्यिक संवाद की जीवंत परंपरा
‘एक शाम साहित्य के नाम’ का यह अगस्त अंक इस दृष्टि से विशेष रहा कि इसमें साहित्य को केवल रचनाओं के पाठ तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि साहित्यकार के जीवन, उसकी सोच, अनुभवों और सामाजिक दृष्टि को भी संवाद का हिस्सा बनाया गया।
डॉ. विकास शुक्ला की सहज अभिव्यक्ति, श्रीमती सरोज कुमार के सारगर्भित प्रश्न और शब्दवीणा के साहित्यिक वातावरण ने मिलकर इस आयोजन को रोचक, सार्थक और स्मरणीय बना दिया।
अंततः कार्यक्रम ने यही संदेश दिया कि शब्द केवल लिखे नहीं जाते, वे जिए भी जाते हैं। जब शब्द संवेदना से जुड़ते हैं, तो वे कविता बनते हैं; जब कविता जीवन से जुड़ती है, तो साहित्य बनती है और जब साहित्य समाज की चेतना को स्पर्श करता है, तब वह कालजयी हो जाता है।डॉ. विकास शुक्ला की पंक्ति-“सुना है शब्द हैं ब्रह्म, ये मरा नहीं करते, मैं इन शब्दों में बस कर अमर हो जाऊँगा”-पूरे आयोजन की सार्थकता को मानो एक ही सूत्र में पिरो देती है। शब्दवीणा का यह साहित्यिक उपक्रम साहित्यकारों को जोड़ने, संवाद को जीवित रखने और साहित्य की संवेदनशील परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में एक प्रशंसनीय प्रयास के रूप में सामने आया।
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