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जब से हमने सच को सच कहना सीखा है

जब से हमने सच को सच कहना सीखा है,

फूलों से ज्यादा जग में, काँटों को सींचा है।
दोस्त निकलते, नजर बचाकर सड़कों पर,
हमसे ज्यादा भीतर का डर, उनको भीँचा है।


सच कोई बात न कह दूँ, वो डरते है,
झूठ मुखौटे, सबके ही चेहरे सजते है।
तन गोरे- मन के काले, चेहरे दिखते,
सीरत न जाने, सब सूरत पर मरते है।

डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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